लता बिष्ट चंपावत में जिला पर्यटन विकास अधिकारी की जिम्मेदारी निभा रही हैं। उनका परिचय इतना भर नहीं है, उन्हें 1994 में बेहद दुर्गम ट्रेल्स दर्रे को पार करने वाली पहली महिला होने का गौरव भी हासिल है।
पर्वतारोहण के कई सफल अभियानों का नेतृत्व कर चुकीं लता को 2001 में भारतीय महिला दल का नेतृत्व करते हुए 6695 मीटर की माउंट गंगोत्री प्रथम पर सफल आरोहण करने पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने सम्मानित किया था। 1999 में मैकमोहन रेखा पर स्थित मुकुट पर्वत पूर्व पर प्रथम आरोहण करने पर रक्षा सचिव ने प्रशस्ति पत्र दिया।
पर्वतारोहण के अलावा वॉटर स्पोर्ट्स, विंटर स्पोर्ट्स में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक शिरकत करने वाली लता को 2011 में राज राजेश्वरी सम्मान और 2015 में तीलू रौतेली पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा साउथ पोल अंटार्कटिका अभियान 2009 में राष्ट्रमंडल साहसिक अभियान में भी वे हिस्सा ले चुकी हैं।
30 साल से महिला उत्थान के लिए कार्य कर रहीं डॉ. किरन
हिमालयन इंवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजरर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन (हैस्को) से जुड़ीं वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. किरन नेगी पिछले 30 सालों से महिला उत्थान के लिए कार्य कर रही हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय स्तर तक के पुरस्कार भी मिले हैं।
डॉ. किरन रावत नेगी ने धूपबत्ती-अगरबत्ती के निर्माण में स्थानीय बायोमास संसाधनों का प्रयोग कर प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराकर सहयोग दिया है। उन्होंने जनजातीय क्षेत्र की महिलाओं को फल व सब्जी संरक्षण केंद्र खोलने के लिए भी प्रेरित किया और बाजार भी उपलब्ध कराया।
उनके द्वारा वर्ष 1990 में स्थापित संरक्षण केंद्र आज भी कार्य कर रहे हैं। डॉ. किरन नेगी ने जनजातियों को कार्पेट बुनाई में सुधार व उच्च गुणवत्ता के लिए बेहतर तकनीक प्रदान की। वह कुछ लोगों की नशे की लत छुड़ाने में भी सफल रहीं। डॉ. किरन नेगी ने ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय फसलों जैसे झंगोरा, मंडुआ व अन्य मोटे अनाजों का उपयोग सिखाकर रोजगार के अवसर प्रदान किए।
उत्तराखंड, हिमाचल व जम्मू कश्मीर में 200 महिलाओं को पोषक बेकरी के लिए प्रशिक्षत किया। विभिन्न गांवों से लगभग 450 महिलाओं को प्रसाद, धूपबत्ती, अगरबत्ती व टोकरी बनाने का प्रशिक्षण दिया। घरों में परंपरागत रूप से लगे पुराने छत्तों को मधुमक्खी पालन के लिए पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। डॉ. किरन नेगी ने राष्ट्रीय स्तर पर एक वाईज नाम का समूह भी बनाया, जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं की समस्याओं व आवश्यकताओं की वकालत करना है। इस समूह में लगभग 1200 महिलाएं जुड़ी हैं।
देहरादून की दीपिका बंगारी महिलाओं को निशुल्क सिलाई प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं। कपड़ों की सिलाई को सहज बनाने के साथ ही ये महिलाएं फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रही हैं। दीपिका बंगारी ने तीन साल पहले लोन लेकर सिलाई सेंटर खोला था। दीपिका अब तक 60 महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं।
दून के गणेशपुर की रहने वाली दीपिका का उद्देश्य जरूरतमंद महिलाओं के बीच में रहकर उन्हें सिलाई सिखाने में मदद करना है, जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें। वर्तमान में दीपिका के प्रशिक्षण केंद्र में करीब 30 महिलाएं व युवतियों को सिलाई के गुर सिखाए जा रहे हैं।
दीपिका ने बताया कि प्रशिक्षण सेंटर से पहले उन्होंने कई निजी कंपनियों में नौकरी की। इस दौरान उन्होंने देखा कि अवसर होने के बावजूद भी महिलाएं स्वरोजगार से नहीं जुड़ पा रही हैं। इसका मुख्य कारण महिलाओं का जागरूक न होना है। दीपिका के पति जसबीर सिंह बंगारी सर्वे ऑफ इंडिया में कार्यरत हैं। दीपिका का एक 12 साल का बेटा और एक ढाई साल की बेटी है।
मां से मिली महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा
दीपिका ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा उन्हें मां से मिली। उनकी मां स्व. लक्ष्मी देवी महिलाओं को स्वरोजगार से जुड़ता देख बहुत खुश होती थीं। दीपिका को भी वह अक्सर खुद का काम करने की राय देती थीं। दीपिका ने अपने प्रशिक्षण केंद्र का नाम भी मां के नाम पर रखा है।
दीपिका ने बताया कि उनके क्षेत्र में सिलाई के साथ-साथ बहुत सी महिलाएं होली के लिए हर्बल रंग भी बना रही हैं। उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए दीपिका लगातार जिला ग्रामोद्योग बोर्ड से संपर्क कर रही हैं, जिस पर जिला ग्रामोद्योग अधिकारी डॉ. अलका पांडेय ने हर संभव मदद का आश्वासन दिया है।
पत्नी को वकील बनाने के लिए पति ने छोड़ी नौकरी
एक बेटी के सपने को पूरा करने के लिए पहले परिवार वालों ने सहयोग किया और फिर पति ने हर मोर्चे पर साथ दिया। हम बात कर रहे हैं दून की कल्पना चावला की। कल्पना को वकालत की पढ़ाई कराने के लिए उनके पति मनीष कुमार ने लाखों रुपये के पैकेज वाली नौकरी छोड़ दी और पत्नी के साथ में खुद भी वकालत की। अब दोनों दून में प्रेक्टिस कर रहे हैं।
दुधली निवासी कल्पना ने बताया कि उनका सपना वकील बनने का था, लेकिन एमए करने के बाद उनकी मनीष से शादी हो गई। शादी के बाद कल्पना ने वकालत करने की इच्छा जताई तो मनीष ने हर मोर्च पर साथ खड़ा रहने का वादा किया।
एमबीए की पढ़ाई करने के बाद दून में ही एक निजी कंपनी में नौकरी कर रहे मनीष ने नौकरी छोड़ पत्नी के साथ वकालत करने का मन बनाया और दोनों ने डीएवी कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में दोनों ने अपने बेटे शिवाय के नाम पर ऑफिस खोल वकालत कर रहे हैं। वहीं, कल्पना के ससुर रमेश कुमार ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। बेटे के त्याग के बाद बहू को मिली कामयाबी से परिवार के हर सदस्य को खुशी है।
परिवार के हर एक सदस्य ने दिया सहयोग
कल्पना ने कहा कि महिलाओं को परिवार की ओर से मिलने वाला सहयोग सम्मान देने के बराबर है। बताया कि एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका बेटा हो गया था। कोर्ट के काम से उन्हें और उनके पति को कई बार कचहरी जाना पड़ता था। ऐसे में बेटे की देखरेख करने की जिम्मेदारी परिवार के अन्य सदस्यों पर रहती थी, जिसे परिवार के हर एक सदस्य ने अच्छी तरह निभाया। जबकि, शादी से पहले पढ़ाई करने के लिए भी मायके वालों की ओर से पूरा सहयोग किया गया।