बकौल नेहा, पिछले दो दशक में देश की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया है। अब राजनीति में ऐसे लोग आ रहे हैं जो कमजोर, जरूरतमंद के सरोकारों के लिए सड़क पर संघर्ष कर सकते हैं और जिम्मेदारी मिलने पर अपनी योग्यता के जरिये विकास का नया मुहावरा गढ़ सकते हैं। उनकी मानें तो सियासत में एक मिश्रित क्षमता वाला राजनेता चाहिए जो सड़क पर संघर्ष भी करे और अपने ज्ञान से विकास की नई दिशा भी तय कर सके।
बेटा करे तो दबंग और बेटियों पर सवाल
समाज में बेटियों को लेकर बदलाव दिख रहा है। लोग बेटियों की बेटों की तरह फिक्र कर रहे हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है। इसी समाज में बेटा कुछ भी करे तो वह दबंग हो जाता है, लेकिन बेटियां उच्छ श्रृंखल मानी जाती हैं, लेकिन अब सोच बदल रही है। बेटियां पढ़ रही हैं और आगे बढ़ रही हैं।
तब नहीं हो सकेगी नौकरशाही हावी
अक्सर विधायिका पर नौकरशाही के हावी हो जाने की बातें होती हैं। पढ़े-लिखे समझदार संघर्षशील युवाओं के हाथों में राजनीतिक नेतृत्व आएगा तो उनके लिए नौकरशाही को नियंत्रित करना आसान होगा। वे जनहित में योजनाएं, कानून और कार्यक्रम बना सकेंगे और नौकरशाह की मनमानी नहीं होने देंगे।
राष्ट्रीय युवा राजनीति में सक्रिय नेहा जोशी प्रदेश को ही अपनी सियासी जमीन मानती हैं और यहीं रहकर अपना राजनीतिक आधार बनाने का सपना देखती हैं। वे एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर प्रदेश के तीन प्रमुख मुद्दों पर काम करने की सोच रही है। पहला कचरा प्रबंधन हैं, जिसके बारे में उनका विचार है कि इस समस्या के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा गया तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड में भी कचरों के पहाड़ खड़े हो जाएंगे।
वे महिलाओं के मसलों पर काम करना चाहती है। इसके लिए उन्होंने आई लीड नेटवर्क लांच किया है। इस नेटवर्क के जरिये वे ऐसी महिलाओं की टीम तैयार कर रही हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में मुकाम बना चुकी हैं। ये जानकार महिलाएं उन महिलाओं का मार्गदर्शन करेंगी जो उनसे जुड़े क्षेत्रों में कॅरियर बनाने की सोच रही हैं। तीसरा, स्वास्थ्य का क्षेत्र है, जिसमें वे और अधिक कार्य की आवश्यकता महसूस करती हैं।