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उत्तराखंड राजभवन बना 'संस्कृत की पाठशाला'

Sun, 28 Sep 2014 02:32 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून स्थित राजभवन में आयोजित इंटरनेशनल संस्कृत कांफ्रेंस का कार्यक्रम स्थल किसी गुरुकुल सा नजर आया। देश-विदेश से आए संस्कृत के विद्वतजन एक-दूसरे से शिष्यवत विचारों की गूढ़ता समझने की कोशिश करते रहे।
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आयोजित सत्रों में संस्कृत के बारे में कुछ नया जानने-समझने का प्रयास होता रहा। इस मौके पर राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी भी मौजूद रहे।

अनुवाद में रखें मूल भावना का ध्यान
कांफ्रेंस के दूसरे दिन शनिवार सुबह तकनीकी सत्र में विद्वानों ने कहा कि विश्व शांति की स्थापना में संस्कृत में निहित ज्ञान की अहम भूमिका हो सकती है।

नसीहत भी दी गई कि किसी पुस्तक का संस्कृत से अन्य भाषाओं में अनुवाद करते समय ध्यान रखा जाए कि उसकी मूल भावना समाप्त न होने पाए।

विद्वानों ने बताई संस्कृत की महिमा
विश्व शांति और संस्कृत विषयक सत्र में प्रोफेसर रामकृपाल त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत के अध्येता को रोजगार और सम्मान की कभी चिंता नहीं करनी पड़ती।

प्रोफेसर आरसी शर्मा ने कहा कि संस्कृत के नीति साहित्य को मार्गदर्शक ग्रंथों के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है। लेकिन संस्कृत ग्रंथों का अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत संवेदनशील कार्य है।

प्रस्तुत किए शोधपत्र
तकनीकी सत्रों में डॉ. अर्चना गिरि, डॉ. विशाल भारद्वाज, डॉ. कृष्ण कुमार वैदिक, डॉ. निरंजन मिश्र, डॉ. स्मृति घोटे, दिव्या त्रिपाठी ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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इस मौके पर राज्यपाल के सचिव अरुण ढौंढियाल, डॉ. निधि पांडेय, पूनम सोबती, प्रोफेसर महावीर अग्रवाल, प्रोफेसर एचएस धानी आदि रहे।
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