उत्तराखंड में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को भी अब बदल दिया गया है।
आरटीआई के नोडल विभाग सामान्य प्रशासन ने अब इसके लिए सार्वजनिक रूप से आवेदन मांगे हैं। सामान्य प्रशासन विभाग हालांकि इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण उठाया गया कदम बता रहा है पर इस मामले को आरटीआई एक्टिविस्ट प्रक्रिया को लटकाए रखने वाला भी बता रहे हैं।
प्रदेश में अभी तक सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री की कमेटी राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति करती रही है। आयुक्तों केनाम तय करने को इस कमेटी के विवेक पर ही छोड़ा गया था।
पर अब प्रक्रिया बदल दी गई है। अब सामान्य प्रशासन विभाग ने बाकायदा विज्ञापन जारी कर आवेदन मांगे हैं। 28 मई को यह विज्ञापन जारी किया गया था। 29 मई को राज्य सूचना आयुक्त अनिल शर्मा ने आपदा राहत घोटाले का आरटीआई के तहत फैसला सार्वजनिक किया था।
सामान्य प्रशासन विभाग हालांकि इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में उठाया गया कदम बता रहा है। लेकिन, इस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला सामान्य प्रशासन विभाग दे रहा है वह 2012 में जारी हुआ था। उसकेबाद 2013 में डीओपीटी ने भी गाइड लाइन जारी की थी।
2012 के बाद ही सरकार ने दो राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भी की। सूचना आयुक्त के रूप में एक अधिकारी को भी नियुक्त किया गया जो खुद पहले सामान्य प्रशासन विभाग में तैनात थे। फिर अब मई में ऐसी क्या जरूरत पड़ी की कि सामान्य प्रशासन विभाग को इस प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ा। अब अगर यह प्रक्रिया बदली गई है तो फिर पहले की नियुक्तियों का क्या।
राज्य सूचना आयुक्तों की मानें तो यह प्रक्रिया पारदर्शिता के लिहाज से बेहतर है। पर इसका एक खामियाजा यह भी हो सकता है कि प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। डीओपीटी के दिशा निर्देश में यह साफ है कि कुल पद के पांच गुना नामों को सचिव स्तर की कमेटी शार्ट लिस्ट करेगी। इसकेबाद यह नाम मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली कमेटी को सौंपे जाएंगे।