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गंगा के कछुओं को खा रहा ‘ड्रैगन’

Sun, 31 May 2015 01:54 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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गंगा में पल रहे 10 हजार कटहवा कछुओं को हर साल चीन खा जाता है।
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यह वह आंकड़ा है, जिसकी तसदीक पटना यूनिवर्सिटी के एक ताजा सर्वे में हुई है। वैसे तस्करी से चीन में खाने के लिए बेचे जाने वाले कछुओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। कछुओं के साथ गंगा नदी के डेढ़ लाख मेंढकों को भी ‘ड्रैगन’ अपने हलक का निवाला बना रहा है।

चीनी गंगा के कछुओं का मांस बड़े चाव से खाते हैं। कटहवा कछुआ (निलसोनिया गैंजेटिका) का मांस इसलिए भी अधिक पसंद किया जाता है कि इसके शरीर का खोल मुलायम होता है। बीते दिनों वन अनुसंधान संस्थान में पांच राज्यों के वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय बैठक में जब गंगा में जैव विविधता को बचाने की बात चली तो कछुओं और मेंढकों की तस्करी पर चिंता व्यक्त की गई थी।
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इस मुद्दे को अब अविरल गंगा की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में शामिल किया जा रहा है। सर्वेक्षणों की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि उत्तराखंड से यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक गंगा में कछुओं की तस्करी की जा रही है। जीवों के तस्करों का सबसे मजबूत मकड़जाल यूपी और बिहार में है।

पटना यूनिवर्सिटी के जंतु विज्ञान विभाग ने वर्ष 1998 और वर्ष 2013-14 में गंगा का सर्वे किया था। प्रोफेसर आरके सिन्हा के सर्वेक्षण में पाया गया कि तस्कर चीन में हर साल 10 हजार कटहवा कछुआ बेचते हैं। तकरीबन डेढ़ लाख मेंढकों की खेप चीन भेजी जाती है। गंगा नदी से अवैध तरीके से पकड़े जा रहे कछुओं और मेंढकों की तस्करी की तसदीक बिहार के पूर्व प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर वशिष्ठ नारायण झा समेत दूसरे राज्यों से आए विज्ञानियों ने भी की।

ऐसे होती है तस्करी
माफिया के एजेंट गंगा किनारे रहने वाले मछुआरों से कछुआ और मेंढक पकड़वाते हैं। इन्हें तस्करी कर बिहार और कोलकाता ले जाया जाता है। कछुओं की खेप नेपाल के रास्ते चीन भेजी जाती है। तस्कर पश्चिम बंगाल से भी कछुओं की खेप बांग्लादेश पहुंचाते हैं। यहां से कछुओं को अन्य स्थानों पर पहुंचाया जाता है।
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क्या है खास
- गंगा में कटहवा, टेक्टम, बतागुन बस्ता, चित्रा रेडिका समेत कछुओं की 18 प्रजातियां हैं।
- गंगा में 11 प्रजातियों के मेंढक पाए जाते हैं।
- गंगा की जैव विविधता के ये महत्वपूर्ण घटक हैं।
- सबसे अधिक तस्कर यूपी और बिहार के हैं।

गंगा से कछुओं और मेंढकों को हर साल इतनी बड़ी संख्या में अवैध तरीके से पकड़ा जाना नदी की जैव विविधता के अस्तित्व के लिए खतरनाक है। सरकारों को जीव तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
- प्रोफेसर आरके सिन्हा, जंतु विज्ञानी
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