नेपाल की ओर से भारतीय क्षेत्र कालापानी, लिपुलेख, लिंपियाधूरा को अपने देश का हिस्सा बताने के बाद सीमांत के लोगों में नेपाल के प्रति आक्रोश है। अमर उजाला ने इस संबंध में पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखंड एवं मुख्य केंद्रीय संरक्षक नृप सिंह नपलच्याल से वार्ता की। उन्होंने कहा कि नेपाल की एकतरफा कार्रवाई कतई स्वीकार्य योग्य नहीं है। दोनों राष्ट्रों को मैत्रीपूर्ण वातावरण में बातचीत से इस विवाद का समाधान निकालना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारे क्षेत्रीय इतिहास और भूगोल में महाकाली नदी का उद्गम स्थल सदैव कालापानी ही रहा है और रहेगा। जिस नदी को नेपाल अब काली नदी बताने की कोशिश कर रहा है वह हमेशा ही ‘कुटीयंग्ती’ रहा है और रहेगा। कुटीयंग्ती का नेपाल से कभी संबंध नहीं रहा है। वह भारत की आंतरिक नदी है, जो गुंजी-नपलच्यो गांवों के छोर पर महाकाली नदी में मिल जाती है। लिपुलेख व लिम्पियाधूरा में भी किसी तरह का सीमा विवाद नहीं है।
यह हमारी चीन के साथ निर्विवाद सीमा को निर्धारित करती है, जिसका नेपाल से दूर- दूर का भी संबंध नहीं है। लिपुलेख कैलाश मानसरोवर यात्रियों और भारत-चीन सीमा व्यापार का मुख्य सीमा प्रवेशद्वार रहा है, जो हजारो वर्षों से भारत-तिब्बत (चीन) की सीमा रही है। भारत और नेपाल के मध्य सदियों से सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, पारिवारिक और अच्छे पड़ोसी के संबंध रहे हैं।
दोनों देशों के मध्य 1800 किमी से अधिक खुली और शांतिपूर्ण सीमा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। अत: दोनों देशों को आपसी विवादों का शांति के वातावरण में बातचीत द्वारा समाधान निकालना चाहिए। ऐसे मसलों का कभी एक पक्षीय समाधान नहीं हो सकता है।
नृप सिंह नपलच्यू ने सीमांत के सभी भारतीय और नेपाली बंधुओं से अपील की है कि वे अनावश्यक व भड़काऊ बयानबाजी न करें। सीमा पर अब तक कायम शांति के माहौल को बनाए रखें। यह दोनों देशों के नेतृत्व के द्वारा हल किया जाने वाला मुद्दा है। स्थानीय समाधान का मुद्दा नहीं है। अत: सोशल मीडिया पर भी अनर्गल चर्चा न करें व संयम बनाए रखें। उन्होंने कहा कि दोनों राष्ट्र अच्छे मित्र व घनिष्ठ पड़ोसी रहे हैं और हमेशा रहेंगे।