परिवार के बुजुर्ग बताते थे कि उस युद्ध के समय कुटी गांव में खेती का कार्य पूरा हो चुका था। गांव में फसल पक गई थी। लोगों में काफी भय का माहौल था। बुजुर्गों ने आपस में वार्तालाप करके जो होगा देखा जाएगा सोचकर फसल की कटाई की। इसके बाद निचली घाटी में वापस लौट आए। अन्य गांव के लोगों ने युद्ध का माहौल देखते हुए अपने-अपने सामानों को बांधकर कुछ पड़ावों में पहुंचाना भी शुरू कर दिया थाः-सत्यवान सिंह कुटियाल, कुटी निवासी
- हथियार चलाने की मिली थी ट्रेनिंग
सीमांत के लोगों ने युद्ध के समय हर प्रकार के सहयोग देने के बाद 1965 से 1970 के बीच सिविल एसएसबी के अधिकारियों ने सीमान्त के लोगों को 45 दिनों तक हथियार चलाने का ट्रेनिंग दी थी। मैंने और मेरे मित्र शेर सिंह ग्वाल, स्व जगत सिंह ग्वाल और महेन्द्र दताल के अलावा कई महिलाओं ने भी ट्रेनिंग ली थी। सीमा पर जाने वाले जवानों को सलामी देते समय गर्व की अनुभूति होती थीः- फल सिंह बोनाल, सेवानिवृत्त इंजीनियर दारमा
- लोकनृत्य के द्वारा बढ़ाया मनोबल
1962 युद्ध के समय सीमांत के गुंजी,नपलचु, नाबी और रोंकांग के रं समाज के लोगों ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए गांव से करीब एक किलोमीटर दूर मनीला तक अपने पारंपरिक वेशभूषा और रंगा पहनकर ढाल, तलवार और बाजे के साथ लोकनृत्य किया था। इसके अलावा रसद, हथियार और गोला-बारूद के साथ ही अन्य सामग्री भी विभिन्न पोस्टों में पहुंचाने में सहयोग कियाः-बिशन सिंह गुंज्याल, गुंजी निवासी