उनके मुताबिक 1962 में भारत-तिब्बत के बीच व्यापार होता था। ग्रामीण बाड़ाहोती से होकर ही तिब्बत पहुंचते थे। गांव के 70 वर्षीय कुशाल सिंह खाती बताते हैं कि 1962 के युद्ध के समय हम अपने घोड़ों, बकरियों पर सामान लादकर सेना के साथ बाड़ाहोती मैदान तक पहुंच गए थे।
ग्रामीण बुग्यालों में अपनी बकरियों को चराने ले जाते थे तो पड़ोसी देश की गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखते थे। गांव के ही 78 वर्षीय रुद्र सिंह राणा बताते हैं कि उस युद्ध के समय ग्रामीणों ने सेना के साथ मिलकर काम किया था। सेना को जरूरत का सामान पहुंचाते थे।