1962 में चीन-भारत युद्ध में भाग लेने वाले पांच असम राइफल के जवान रतनपुर निवासी 82 वर्षीय सीता सिंह कहते हैं कि धोखा देने की चीन की पुरानी नीति है। 1962 में चीन ने धोखे से लड़ाई जीती थी। उस समय उसकी खुफिया एजेंसी ने चारों तरफ चीनी सैनिकों का डर फैलाकर सबको भयभीत कर दिया था। उस समय हमारे पास न तो हथियार थे और और साजो सामान।
इसलिए उस समय हमें अपनी पोस्ट से पीछे हटने का आदेश दिया गया। उच्च स्तर से आदेश मिलने के बाद ही सभी सैनिक वापस वहां से लौटने को मजबूर हुए थे। असम राइफल्स के करीब तीन सौ सैनिक उस समय कैद हो गए थे। उनमें से कुछ तिब्बत में तिब्बतियों के साथ मिलकर कई दिनों तक वहीं रहे।
वह बाद में वापस आ गए थे लेकिन अब वह स्थिति नहीं है, हमारी सेना मजबूत है। हमारा एक सैनिक उनके पांच सैनिकों के बराबर है। अब हमारे पास दुनिया के अत्याधुनिक हथियार हैं और वहां एलएसी तक पहुंचने के लिए सड़क भी। अब हम मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं।
देहरादून के बनियावाला निवासी पूर्व सैनिक रुद्र सिंह रावत 1962 में ही सेना में भर्ती हुए थे। उस समय उनकी पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में हुई थी। वह बताते हैं कि युद्ध की घोषणा के बाद उन्हें भी तैयार रहने को कहा गया था। वह युद्ध में जाने को तैयार थे, लेकिन मौका नहीं मिला।
उनका भाई इस युद्ध में शामिल हुआ था। वह बताते थे कि अगर भारतीय सैनिकों को उस समय पोस्ट छोड़ने के आदेश नहीं मिलते और नेतृत्व सही होता तो तब ही चीन बुरी तरह से मात खाता। हमारे एक सैनिक जसवंत सिंह ही चीनी सैनिकों पर भारी पड़ गए थे। अब चीन की हर हरकत का जवाब देने के लिए भारत तैयार है। यह वक्त चीन को सबक सिखाने का है।
जरूरत पड़ी तो मोर्चे पर जाने को तैयार
चीन की इस हरकत पर पूर्व सैनिकों में आक्रोश व्याप्त है। पूर्व सैनिक मानते हैं कि चीन की कुटिल नीति पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। ताकि वह बार-बार इस प्रकार की हरकत न कर सके।
बनियावाला सेवली रोड निवासी पूर्व सैनिक कैप्टन बीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि जब तक भारतीय सेना चीन की इन नापाक हरकतों का मुंहतोड़ जवाब नहीं देती, जब तक उनकी यह हरकतें जारी रहेंगी। चीन की नीति धोखा देने की है और वह धोखा देता रहेगा। जब उसने हरकत की है तो उसे जवाब मिलना ही चाहिए। जरूरत पड़ी तो वह मोर्चे पर जाने का तैयार हैं।