फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गलवां घाटी विवाद: सैनिकों की शहादत से आहत और क्रोधित हैं 1962 में चीन के दांत खट्टे करने वाले वीर

Thu, 18 Jun 2020 10:25 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
indian china war 1962 - फोटो : File Photo
विज्ञापन

चीन के साथ भारत भले ही 1962 में हार गया था, लेकिन उस समय गढ़वाल राइफल की चौथी बटालियन ने जिस वीरता के साथ चीन के दांत खट्टे किए थे, वह भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस बटालियन को उस युद्ध में दो महावीर चक्र मिले थे। इस युद्ध में चौथी गढ़वाल के बैनर तले चीन से लड़ चुके लांस नायक बलवंत सिंह बिष्ट चीन की धोखाधड़ी से आहत हैं।  

विज्ञापन


गलवां घाटी विवाद: लिपुलेख पास पर भारतीय सुरक्षा बल अलर्ट, चीन सीमा पर मेजर रैंक के अधिकारियों की तैनाती

चीन हमें 1962 वाला भारत न समझे 

मूलरूप से चमोली के सीमांत गांव घेस के निवासी 82 वर्षीय बलवंत सिंह बिष्ट चीन में युद्ध बंदी रहे हैं। वह भारतीय सैनिकों की शहादत की खबरें सुनकर विचलित और क्रोधित हैं। वे कहते हैं कि अब उम्र इजाजत नहीं देती, शारीरिक रूप से फिट होता तो सेना से कहता हमें बुलाओ, हम सिखाएंगे इस धोखेबाज चीन को सबक।
विज्ञापन


चीन के साथ 1962 की लड़ाई को याद करते हुए कहते हैं कि तब हमारे पास अच्छे हथियार नहीं थे। चीन के सैनिक संख्या में भी बहुत ज्यादा थे। वे चट्टानों पर बंदर की तरह चढ़ने में सक्षम भी थे, लेकिन अब हमारे पास दुनिया के बेहतरीन हथियार हैं। हमारी सेना आज दुनिया की शक्तिशाली सेनाओं में से एक है। इसलिए चीन हमें 1962 वाला भारत न समझे।

1962 में हमारी चौथी गढ़वाल ने चीन का पूरी हिम्मत के साथ मुकाबला किया और उसको बहुत नुकसान पहुंचाया। आज हमारी फौज तब की तुलना में हथियार और हौसले दोनों से बहुत मजबूत है। चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। घरेलू मोर्चे पर भी हम चीन के सामान का बहिष्कार करके उसे सबक सिखा सकते हैं।

1962 में नहीं थे हथियार, अब हम मजबूत 

1962 में चीन-भारत युद्ध में भाग लेने वाले पांच असम राइफल के जवान रतनपुर निवासी 82 वर्षीय सीता सिंह कहते हैं कि धोखा देने की चीन की पुरानी नीति है। 1962 में चीन ने धोखे से लड़ाई जीती थी। उस समय उसकी खुफिया एजेंसी ने चारों तरफ चीनी सैनिकों का डर फैलाकर सबको भयभीत कर दिया था। उस समय हमारे पास न तो हथियार थे और और साजो सामान।

इसलिए उस समय हमें अपनी पोस्ट से पीछे हटने का आदेश दिया गया। उच्च स्तर से आदेश मिलने के बाद ही सभी सैनिक वापस वहां से लौटने को मजबूर हुए थे। असम राइफल्स के करीब तीन सौ सैनिक उस समय कैद हो गए थे। उनमें से कुछ तिब्बत में तिब्बतियों के साथ मिलकर कई दिनों तक वहीं रहे।

वह बाद में वापस आ गए थे लेकिन अब वह स्थिति नहीं है, हमारी सेना मजबूत है। हमारा एक सैनिक उनके पांच सैनिकों के बराबर है। अब हमारे पास दुनिया के अत्याधुनिक हथियार हैं और वहां एलएसी तक पहुंचने के लिए सड़क भी। अब हम मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं।
विज्ञापन

यह चीन को सबक सिखाने का वक्त 

देहरादून के बनियावाला निवासी पूर्व सैनिक रुद्र सिंह रावत 1962 में ही सेना में भर्ती हुए थे। उस समय उनकी पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में हुई थी। वह बताते हैं कि युद्ध की घोषणा के बाद उन्हें भी तैयार रहने को कहा गया था। वह युद्ध में जाने को तैयार थे, लेकिन मौका नहीं मिला।

उनका भाई इस युद्ध में शामिल हुआ था। वह बताते थे कि अगर भारतीय सैनिकों को उस समय पोस्ट छोड़ने के आदेश नहीं मिलते और नेतृत्व सही होता तो तब ही चीन बुरी तरह से मात खाता। हमारे एक सैनिक जसवंत सिंह ही चीनी सैनिकों पर भारी पड़ गए थे। अब चीन की हर हरकत का जवाब देने के लिए भारत तैयार है। यह वक्त चीन को सबक सिखाने का है। 

जरूरत पड़ी तो मोर्चे पर जाने को तैयार 

चीन की इस हरकत पर पूर्व सैनिकों में आक्रोश व्याप्त है। पूर्व सैनिक मानते हैं कि चीन की कुटिल नीति पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। ताकि वह बार-बार इस प्रकार की हरकत न कर सके।

बनियावाला सेवली रोड निवासी पूर्व सैनिक कैप्टन बीरेंद्र सिंह रावत कहते हैं कि जब तक भारतीय सेना चीन की इन नापाक हरकतों का मुंहतोड़ जवाब नहीं देती, जब तक उनकी यह हरकतें जारी रहेंगी। चीन की नीति धोखा देने की है और वह धोखा देता रहेगा। जब उसने हरकत की है तो उसे जवाब मिलना ही चाहिए। जरूरत पड़ी तो वह मोर्चे पर जाने का तैयार हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें