कविवर सुमित्रानंदन पंत 1918 में अपने मझले भाई के साथ काशी चले गए और वहां क्वींस कालेज में पढ़ाई की और हाईस्कूल के बाद इलाहाबाद के तत्कालीन प्रसिद्ध अंग्रेजी मीडियम के म्योर कालेज में पढ़ने चले गए। इस बीच 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर सुमित्रानंदन पंत ने म्योर कालेज छोड़ दिया और घर पर ही हिंदी साहित्य और संस्कृत आदि पढ़ने लगे।
चिदंबरा तथा कला और बूढ़ा चांद सहित कई चर्चित रचनाएं
प्रगतिशील पत्रिका रुपाभ का 1938 में संपादन किया। 1950 से 1957 तक आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे, फिर 1958 में चिदंबरा का प्रकाशन हुआ। इसी रचना पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1960 में कला और बूढ़ा चांद काव्य संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1964 में उनके प्रसिद्ध महाकाव्य लोकायतन का प्रकाशन हुआ। उनकी कुछ अन्य रचनाओं में ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, सत्यकाम आदि हैं। उनकी कुल 28 पुस्तकें प्रकाशित हुई जिसमें हिंदी कविताओं के अलावा नाटक और निबंध आदि शामिल हैं।
कौसानी के घर में अब है सुमित्रानंदन पंत वीथिका
कौसानी में स्थित कविवर सुमित्रानंदन पंत के घर में 1987 में सुमित्रानंदन पंत वीथिका स्थापित की गई। वीथिका में कविवर पंत को मिले सामान पत्र, उनकी जन्म कुंडली, उनके जीवन से जुड़े छाया चित्र, उनकी प्रयोग की गई कुर्सी मेज, चश्मा, अटेची, चादर आदि सामान रखा गया है।
गुसाईं दत्त से बदलकर खुद रखा था सुमित्रानंदन नाम
कौसानी में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद जब वह चौथी कक्षा में प्रवेश के लिए अल्मोड़ा आए तो उनका ध्यान अपने नाम पर गया। कविवर पंत ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राम के भाई लक्ष्मण से प्रभावित होकर उन्होंने खुद अपना नाम गुसाईं दत्त से सुमित्रानंदन रख लिया। नेपोलियन और रवींद्र नाथ टैगोर के युवा चित्रों को देखकर केश बढ़ा लिए और आजीवन उनका यह शौक बना रहा।