केदारनाथ से धराली तक खतरे की तस्वीर
2013 की केदारनाथ त्रासदी और जुलाई 2023 में हिमाचल प्रदेश में आई विनाशकारी बाढ़ जैसी घटनाओं ने दिखाया है कि हिमालय में मौसम की छोटी अवधि की तीव्र घटनाएं कितनी बड़ी तबाही पैदा कर सकती हैं। अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली में कुछ ही मिनटों में आया मलबे का प्रवाह भी इसी बढ़ते जोखिम की गंभीर तस्वीर सामने लाता है।
अब सवाल बारिश की मात्रा नहीं, उसकी रफ्तार और जगह का
प्रो. अग्रवाल के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि अब सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी क्षेत्र में कुल कितनी बारिश हुई। यह देखना ज्यादा जरूरी होगा कि बारिश किस घाटी में हुई। कितनी देर में हुई और उसके नीचे आने पर कौन-सी बस्ती, सड़क, नदी या पुल खतरे में आएगा। इसके लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम निगरानी केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने, हिमनद झीलों की लगातार निगरानी करने और बस्तियों को जोखिम के आधार पर चिह्नित करने की जरूरत है। हिमालय का तापमान बढ़ना केवल पर्यावरण का संकट नहीं है। इसका सीधा असर पानी, सड़क, खेती, पर्यटन और पहाड़ों में रहने वाली आबादी की सुरक्षा पर पड़ने वाला है।