ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन पर बनने वाली सुरंगें
ढालवाला से शिवपुरी-10.850 किमी
शिवपुरी से गूलर-6.470 किमी
गूलर से व्यासी-6.720 किमी
व्यासी से कौड़ियाला-2.200 किमी
कौड़ियाला से बागेश्वर-9.760 किमी
राजचौरा से पौड़ी नाला-220 मीटर
पौड़ी नाला से सौड़ (देवप्रयाग)-1.230 किमी
सौड़ से जनासू-15.100 किमी
लछमोली से मलेथा-2.800 किमी
मलेथा से नैथाणा (श्रीनगर)-4.120 किमी
श्रीनगर से परासू (धारी)-9.000 किमी
परासू से नरकोट-7.080 किमी
नरकोट से तिलनी-9.420 किमी
तिलनी से घोलतीर-6.460 किमी
घोलतीर से गोचर-7.160 किमी
रानो से सिवई-6.400 किमी
सुरंगों के यह फायदे
-जल विद्युत परियोजनाओं में सुरंग बनाने से ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी कमी दूर हो सकती है।
-रेल लाइन सुरंग से गुजरने पर बरसात के मौसम में भू-स्खलन आदि का खतरा नहीं होगा। रेल सेवा चलेगी, जिससे पर्यटक, तीर्थयात्रियों की संख्या भी बढ़ेगी।
-पहाड़ में बरसात के सीजन में रोड कनेक्टिविटी की चुनौती भी दूर होगी।
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सुरंगों से होने वाला विकास, विनाश की तरफ धकेलेगा
सरकार पहाड़ की रीढ़ को कमजोर कर रही है। मध्य हिमालयी क्षेत्र में आने वाला उत्तराखंड बाढ़-भूस्खलन, भूकंप की जद में है। सरकार की योजनाएं आने वाले समय में 6000 से अधिक गांवों को सुरंगों के ऊपर पहुंचा देंगी। आज भी जो सुरंगें बन रही हैं, उनका दुष्प्रभाव ऊपर के पहाड़ी क्षेत्रों में मकानों में दरारों के रूप में नजर आने लगा है। इन सारे खतरों को समझने के बावजूद सरकार नजरअंदाज कर रही है। सुरंगों के इस विकास की रफ्तार को हमें रोकना होगा।
-सुरेश भाई, पर्यावणविद्