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कैसे होगा स्वाइन फ्लू रोगियों का इलाज!

Fri, 20 Mar 2015 01:21 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
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स्वाइन फ्लू रोगी हर्षपति गैरोला की मौत ने देहरादून की चिकित्सा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है।
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13 दिन अस्पताल में इलाज कराने के बाद डिस्चार्ज करने के अगले ही दिन गैरोला की मौत हो र्गई थी। इससे सवाल खड़े हो गए हैं कि रोगी इतना गंभीर था तो उसे अस्पताल से छुट्टी क्यों दी गई? महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डा. जीएस जोशी का कहना है कि अस्पताल से इसकी वजह पूछी जाएगी।

बुधवार को हुई गैरोला की मौत ने यह भी सवाल उठा दिया है कि 13 दिन तक दवा देने के बावजूद वह ठीक क्यों नहीं हुए। जो टेमी फ्लू टेबलेट स्वाइन फ्लू रोगियों को खिलाई जा रही है, वह मानक के अनुरूप है या नहीं। यह भी बता दें कि टेमी फ्लू की मांग अचानक बढ़ी थी, जबकि कंपनियों के पास पर्याप्त स्टॉक नहीं था।
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सूत्र बताते हैं कि कंपनियां दूसरी फैक्टरियों से माल बनवाने के बाद अपना लेबल लगाकर सप्लाई करती हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने अब तक इन दवाओं की जांच नहीं कराई हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि रोगियों को दी जा रही दवा ठीक है भी या नहीं।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व दून अस्पताल में दवाओं की गुणवत्ता घटिया मिली थी, कुछ दवाएं एक्सपायर भी हो चुकी थीं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि बस यही कोशिश की जा रही है कि जहां से मिले दवाओं की व्यवस्था हो।

...तो दून अस्पताल भेज देते
महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा डा. जीएस जोशी का कहना है कि गंभीर रोगी को इस तरह से छुट्टी देना समझ से परे है। अगर रोगी अस्पताल का खर्च नहीं उठा पा रहा था या कोई और बात थी तो रोगी को दून अस्पताल भेज दिया जाना चाहिए। दून अस्पताल में स्वाइन फ्लू रोगियों के लिए अलग से वार्ड बना है, वहां इलाज की पूरी व्यवस्था है। लेकिन गंभीर मरीज को घर भेजना गलत है।

ठीक होने के बाद भी खतरा
हिमालयन इंस्टीट्यूट जौलीग्रांट की मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनीता शर्मा, दून अस्पताल के सीनियर फिजिशियन डा. महावीर सिंह का कहना है कि स्वाइन फ्लू एक बार निगेटिव होने के बाद डेंगू की तरह ‘रिलैप्स’ नहीं करता है।
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अगर रोगी वेंटीलेटर पर है या बहुत अधिक कमजोर है तो बैक्टीरियल संक्रमण हो सकता है। इससे निमोनिया, सांस तंत्र का ध्वस्त होना (एआरडीसी) और सेप्टीसीमिया हो सकता है।
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