हरीश के हरिद्वार दुर्ग की बुनियाद हिलती दिख रही है। वर्ना इस बात की कोई वजह नहीं है कि पिछले पांच साल में हरीश रावत ने जिस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाकर सबसे ज्यादा समय दिया, राहुल की रैली में उसी क्षेत्र की मौजूदगी दमदार नहीं रही।
इस क्षेत्र के पिछड़ों व अकलियतों की कम संख्या रणनीतिकारों की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है।
हरिद्वार से नहीं आई अपेक्षित भीड़
इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बतौर केंद्रीय मंत्री व क्षेत्रीय सांसद के रूप में सबसे ज्यादा समय हरिद्वार जनपद में बिताया। इसी क्षेत्र से आगामी लोकसभा चुनाव में उनके परिवार के किसी सदस्य को चुनाव लड़ाए जाने की चर्चा भी हो रही है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी देहरादून में हुई रैली भीड़ के लिहाज से तो संतोषजनक थी लेकिन जिस हरिद्वार ने हरीश रावत का 20 साल का राजनीतिक वनवास खत्म कर संसद पहुंचाया वहां की भागीदारी अप्रत्याशित रूप से कम होना कम चिंता का विषय नहीं है।
पिछले चुनाव में अकलियतों, पिछड़ों के सहारे जीत दर्ज करने के वाले हरीश को नए सिरे से मंथन भी करना होगा।
मोदी की रैली से तुलना का था डर
रैली के बाद ज्यादातर लोगों की जिरह भीड़ को लेकर रही। वैसे भी जिस भरे मैदान पर मोदी ने जनसभा को संबोधित किया था उसके आधे हिस्से में ही राहुल गांधी की रैली का आयोजन किया गया।
हालांकि कांग्रेस पहले तो इस कार्यक्रम को महिला व पूर्व सैनिक सम्मेलन के रूप में प्रचारित करती रही लेकिन बाद में आकर जनसभा का नाम दे दिया गया। क्योंकि कांग्रेसियों में भी कहीं ना कहीं मोदी की रैली से होने वाली तुलना का डर था।