आज भी अधूरे हैं ये मंदिर
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खड़खड़ के नाम मशहूर वर्तमान खड़खड़ी में नेपाली सेना के सेनापति खड़क सिंह गोरखा ने अपनी सेना के साथ डेरा डाला था। तब नेपाली सेना की छावनी रायवाला के समीप वर्तमान नेपाली फार्म पर लगी थी। खड़क सिंह की सेना ने गढ़वाल पर कब्जा कर लिया।
टिहरी नरेश की गुहार पर ब्रिटिश सेना ने नेपाली सेना का मुकाबला कर एक समझौते के तहत उसे वापस भेजा। तब खड़क सिंह ने खड़खड़ी में खड़खडेश्वर महादेव का निर्माण कराया। सेना के वापस लौट जाने के कारण मुख्य मंदिर तो बन गया, लेकिन इधर-उधर बन रहे दो मंदिर अधूरे रह गए। वे आज भी उसी तरह खड़े हैं।
यूं तो गंगा सहित सभी नदियां समुद्र में मिलती हैं। पुराण वर्णित कथ्य है कि त्रेता में गंगा की महिमा रघुवंश के ऋषियों से सुनकर एक बार श्रावण मास में समुद्र देवता भी हरकी पैड़ी पर स्नान करने आए थे। उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना की जो अब एक धर्मशाला के बीच आ चुका है और समुद्रेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। अपर रोड के गुप्तेश्वर मंदिर में भगवान शिव गुप्त रूप से प्रकट हो गए थे। ज्वालापुर के पुराकालीन जालेश्वर मंदिर में गंगा स्वयं शिवलिंग लेकर पहुंची थी। ऐसे अनेक ऐतिहासिक मंदिर हैं, जिन्हें समय ने भुला दिया है, किंतु श्रावण से याद रखा। आज कल इन सभी मंदिरों में श्रद्धालु लगातार जलाभिषेक कर रहे हैं।