श्रीमहंत मोहन भारती ने बताया कि नागा संन्यासी बनने के कई कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए सबसे पहले नागा संन्यासी को महापुरुष के रूप में दीक्षित कर अखाड़े में शामिल किया जाता है।
तीन वर्षों तक महापुरुष के रूप में दीक्षित संन्यासी को संन्यास के कड़े नियमों का पालन करते हुए गुरु सेवा के साथ अखाड़े में विभिन्न कार्य करने पड़ते है। तीन वर्ष की कठिन साधना में खरा उतरने के बाद कुंभ पर्व पर उसे नागा बनाया जाता है। समस्त प्रक्रिया अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर की देखरेख में सम्पन्न हुई है।
आज स्थापित होगा 141 फीट त्रिशूल्-डमरू
जूना अखाड़ा सोमवार को ललतारो पुल के निकट दु:खहरण हनुमान मंदिर पर 141 फीट ऊंचा त्रिशूल-डमरु स्थापित किया जाएगा। विधि विधान से पूजन के बाद क्रेन की मदद से त्रिशूल और डमरु को स्थापित किया जाएगा।