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रूद्रप्रयाग से केदारनाथ का मार्ग अब तक बंद

Sat, 10 Aug 2013 06:57 PM IST
सुधाकर भट्ट
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केदारनाथ में पूजा शुरू करने की होड़ में सरकार यह भूल ही गई कि केदारघाटी के लोगों में विश्वास जगाने की भी जरूरत है। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ तक का मार्ग अब तक बंद है।
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लिहाजा गुप्तकाशी तक वाया मयाली और लमगौंड़ी होकर पहुंचना पड़ रहा है। आपदा आए दो माह होने को हैं। लेकिन 85 किमी. मार्ग की किसी ने सुध नहीं ली। नतीजा यह है कि चार घंटे में पूरा होने वाला सफर तमाम मुश्किलों के बीच दस घंटे में पूरा हो रहा है।

एकमात्र सड़क मार्ग
रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी पहुंचने के एकमात्र सड़क मार्ग के दरकते रास्ते पर जब गाड़ियां हिचकोले खाती हैं तो लोगों का विश्वास डमगाने लगता है। किमोड़ा के जयप्रकाश के मुताबिक 35 सालों से सड़क ऐसी ही है। न तो इसे पक्का किया गया और न ही इसे सुधारने की जरूरत सरकार ने महसूस की।
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यह सड़क घाटी के 100 गांवों की सांसों की डोर को थामे है। राहत सामग्री इसी बदहाल सड़क से पहुंच रही है। लोगों का कहना है कि यहां की जिंदगी का पर्याय यह सड़क ही है। यह सड़क ही नहीं सुधर पा रही है तो फिर जिया कैसे जाएगा।

लमगौंडी के एक बुजुर्ग के मुताबिक सरकार भले चारधाम यात्रा को जल्द शुरू करा दे। लेकिन अगर यह सड़क नहीं बनी तो लोग कभी विश्वास नहीं कर पाएंगे कि उनके जीवन में कोई और बदलाव हो सकता है। लमगौंडी गांव के 56 परिवारों ने आपदा में अपना कोई न कोई सदस्य खोया है।

राहत लेकर आने वालों के चहेरों पर भले ही संतुष्टि का भाव दिख जाता है। लेकिन लोगों के चहरों से मुस्कान गायब है। यहां राहत सामग्री पहुंची है और मृतक आश्रितों को चेक भी दिए गए हैं। लेकिन जिंदगी जीने का हौसला लोगों के दिलों में जग नहीं पा रहा है।

पार्वती देवी के मुताबिक पिछले साल भी गांव के लोगों ने आपदा में नुकसान झेला था। लेकिन इस बार तो लोग जीने का हौसला नहीं जुटा पा रहे हैं।

लगभग ऐसी ही स्थिति गुप्तकाशी में भी है। आक्सैम, रिलायंस के स्वयंसेवियों सहित एनडीआरएफ, पुलिस और प्रशासन का जमावड़ा है। लेकिन बाजार सूना है।

रोजी-रोटी का क्या होगा
दुकानदारों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। पूरी तरह से चारधाम यात्रा पर निर्भर यह कस्बा अब किसी भी तरह की हलचल से कोसों दूर है। लोगों की चिंता है तो सिर्फ इतनी की रोजी-रोटी का होगा क्या। एक दुकानदार के मुताबिक धंधा चौपट होने से बेकार हुए लोग आपदा प्रभावित की श्रेणी में नहीं आते।
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इन लोगों के सामने भी सवाल यही है कि क्या खाएं और क्या कमाएं। बिजली की आंखमिचौली जारी है। 24 घंटे में दो घंटे भी बत्ती मिल पाना मुश्किल हो रहा है।

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