पिथौरागढ़ के धारचूला से करीब 25 किमी खस्ताहाल सड़क पर पैदल चलने के बाद तांकुल की पहाड़ी के नीचे पहुंचा जा सकता है।
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विद्रूप हो चुकी पहाड़ी के पीछे 20 से अधिक गांव रहते हैं। हरेक व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का दावा करने वाली सरकार ने करीब पांच माह से इस तरफ झांका नहीं।
सरकारी राशन का दाना तक यहां नहीं पहुंचा
आपदा के दौरान फेंके गए राशन के बाद सरकारी राशन का दाना तक यहां नहीं पहुंचा और लोग 80-90 रुपए किलो गेहूं-चावल, 120 रुपए किलो चीनी और पचास रुपए किलो नमक खरीदने को मजबूर हैं।
पिछले दिनों तो लोगों ने यहां नमक 80-90 रुपए किलो तक खरीदा। इस महंगाई से बचने का विकल्प तांकुल तक 80 किमी की पैदल यात्रा है। लेकिन यह एक ऐसा सफर है जहां खुद रास्ता बनाना पड़ता है। इस रास्ते से हर कोई लौटेगा पक्का नहीं।
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जून में आई आपदा के बाद हल्द्वानी और देहरादून में बैठकर देखा जाए तो लगता है स्थिति सामान्य है। लेकिन तांकुल की पहाड़ी से जान खतरे में डालकर उतर रहे लोगों को देखकर दावों की पोल खुलती है।
पांच महीने की मेहनत के बाद 21 नवंबर को तांकुल तक सड़क खुली है। इसके आगे 80 किमी में गर्गवा, जमकू, खेत, सुआ, तेजम, दर, बोंगलिंग, दुग्तू, सैला, चल, नांगलिंग, बागलिंग, सौन, दांतू, सीपू, मारछा, ढाकर, फिल्म, बॉन, सोबला और लामरती जैसे कई गांव आज भी फंसे हैं।
इन गांवों से शासन-प्रशासन भी कटा हुआ है
सड़क से कटे होने के कारण पिछले 5 महीनों से इन गांवों से शासन-प्रशासन भी कटा हुआ है। मुकेश दरियाल और सुपेंद्र दरियाल करीब 45 किमी चलकर दर से तांकुल पहुंचे हैं।
दोनों युवा हैं उन्हें 45 किमी सफर तय करने में करीब दस घंटे लगते हैं। लेकिन दर में हर घर में ऐसे युवा नहीं हैं जो सामान खरीदने के लिए धारचूला तक पहुंचें।
इसलिए बुजुर्गों के सामने महंगाई के आगे दम तोड़ने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। मुकेश बताते हैं कि पिछले दिनों उनके परिवार ने 80 रुपए किलो नमक खरीदा है। इन दिनों 50 रुपए प्रति किलो हैं।
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गेहूं-चावल आज भी 80-90 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। चीनी 120 रुपए किलो है और एक रुपए में मिलने वाली माचिस दो रुपए की है। धारचूला से सामान खरीदकर लाना और महंगा सुपेंद्र बताते हैं कि धारचूला से सामान खरीदकर गांव ले जाना भी बेहद महंगा हैं।
तीस किलो वजन की चीज ले जाने के लिए करीब 1500 रुपए का भुगतान मजदूर को करना पड़ता है। इसके अलावा, जानलेवा रास्ते से सामान ले जाते वक्त यदि मजदूर के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है तो यह अलग मुसीबत है।
सैकड़ों युवाओं का रोजगार भी चौपट
खच्चर से भी लोग दर और बौंगलिंग तक राशन पहुंचा रहे हैं। इसमें 70-80 किलो वजन के लिए करीब 2 हजार रुपए का भुगतान करना पड़ता है। महंगाई के अलावा तमाम गांवों के सैकड़ों युवाओं का रोजगार भी चौपट हुआ है।
दर, सोबला, लामरती, खेत, छिरकिला में करीब 45 गाड़ियां फंसी हुई हैं। इसमें कई वाहन ऐसे हैं जो अभी 5 हजार किमी भी नहीं चले। सुपेंद्र, मुकेश और उनके साथियों को इस हालत के लिए किसी से गुस्सा नहीं क्योंकि वह उत्तराखंड सरकार से किसी तरह की उम्मीद नहीं रखते।