नेताओं की बात करते-करते एक एसडीएम साहब अचानक मायूस हो गये। कहने लगे कि वेतनमान तो कम मिल ही रहा है अब इज्जत मिलनी भी बंद हो गई है। इतना सारा काम करो।
चिरकुट से चिरकुट नेता को इज्जत से बैठाओ, चाय-पानी पिलाओ। उस पर भी वह नेता डांटकर बात करता है। सत्ता दल का नेता हो तो उसकी ठकुरसुहाती करनी ही पड़ती है, पता नहीं कौन, कहां जाकर कुछ घोंस दे। बैठे-बैठे बबाल झेलो और जवाब देते फिरो।
किसी को फोन मिलाते-मिलाते एसडीएम साहब बड़बड़ाते रहे। फोन किसी को मिलाया था। फोन बुक में किसी का नाम नहीं प्रॉपर्टी डीलर लिखा हुआ था। प्रॉपर्टी डीलर को जैसे ही फोन मिला, वह उठकर एक तरफ चले गए, खुसुर-पुसुर वाले अंदाज में बतियाते रहे। बातचीत सुखद थी।
उनका मूड बदल गया। कुर्सी पर आकर फिर बैठ गए। सुर बदला हुआ था। बोले-इस जमाने में कोई गरीब नहीं है। सड़ी से सड़ी झोपड़ी में जाकर देखो टीवी और फ्रिज रहता है। मजदूरों के पास फेसबुक है भाई, बाकायदा चेटिंग करते हैं।
कहां है गरीबी? अब लोग आंय-बांय-शांय इच्छा रखेंगे तो पूरी करने में पैसा की जरूरत तो होती ही है। चादर पांच मीटर की होती है पैर 50 मीटर फैला कर चिल्लाते हैं खामख्वाह।