1- इसलिए अब वह कुछ करते ही नहीं
एक दिन में चार घोषणाएं। साहब की आदत है। अब तो कर्मचारी भी साहब की घोषणाओं पर सिगरेट की धुएं के छल्ले उड़ाते हैं।
साहब, अक्सर ताकीद करते हैं कि वह शहर के लिए कुछ करना चाहते हैं। वह बहुत हार्ड वर्कर है। फिर एक नई घोषणा कर देते कि अब इस दिन से शहर में यह होगा। दूसरे दिन अखबारों में साहब की फोटो भी छपती और खबर भी।
घोषणा करते-करते साहब को 15 दिन हो गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं, अब न कोई उन्हें गंभीरता से लेता है और न ही अखबार। अब साहब, नए पैंतरे तलाश रहे हैं अखबरों में बने रहने के लिए। इसलिए अब वह कुछ करते ही नहीं।
2- कार्ड के चक्कर में परेशान हो गए
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के तहत शहर के आंगनबाड़ी केंद्रों में फार्म तो भरे गए, लेकिन इन फार्मों ने जिला पूर्ति विभाग के अधिकारियों के पसीने छुड़ाए हुए हैं।
विभागीय अधिकारी व कर्मचारी पर्चियां लेकर पहुंच रहे लोगों से परेशान हो चुके हैं। सोमवार के एक अधिकारी के पास कुछ लोग पर्चियां लेकर पहुंचे और कार्ड मांगने लगे, तो वह अधिकारी सिर पकड़कर बैठ गया। बोला इस खाद्य सुरक्षा योजना ने तो हमारा जीना हराम कर दिया है।
कार्ड भरे आंगनबाड़ी केंद्रों में और मुसीबत हमारे लिए हो गई। वहां से फार्म जो मिले हमने बना दिए, अब जो मिले ही नहीं तो कार्ड कहां से बनाएं। लोगों को समझा-समझा कर परेशान हो गए हैं।