एक विभाग के अधिकारी मेहनत और रविवार को भी फाइलें निपटाने के लिए जाने जाते हैं। शनिवार को साहब मातहतों की बैठक ले रहे थे, तभी साहब का मोबाइल फोन बज उठा। बातचीत शुरू हुई तो दूसरी ओर से आई तेज आवाज सुन सब समझ गए कि साहब की मैडम हैं।
साहब शांत सुनते रहे, सामने बैठे मातहत भी उनके माथे पर चढ़ती-उतरती रेखाओं से स्थिति का आकलन करते रहे। कुछ देर बाद साहब फट पड़े, बोले, ‘तुम्हारी इन्हीं हरकतों के कारण मुझे संडे को भी आफिस आना पड़ता है।’
तैश में आए साहब की नजरें सामने बैठे मातहतों पर गईं तो अचानक सब याद आ गया और वे खामोश हो गए, लेकिन मातहतों के आगे तो राज खुल ही गया था।
कुछ ऐसा है दून के अफसरों और नेताओं का रुबाब
राष्ट्रीय पार्टी से जुड़े प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता को दूसरे राज्य के विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत से ‘एक्सपोजर’ क्या मिला, प्रदेश में उनके प्रतिद्वंद्वी जल-भुन गए।
स्थानीय स्तर पर कड़ी मेहनत के बाद इन नेताओं ने बार-बार झटके देकर नेताजी का ग्राफ गिरा दिया था। अब खुद ही खुद को ढांढस बंधाते दिखते हैं। कहते हैं, ‘जहां जीत रहे थे, वहीं भेज दिया। कहीं और भेजते तब पता चलता।’
...नेताजी की चल निकली
दुश्मन जल रहे हैं और नेताजी खुश हैं। ऊपर तक पहुंच बढ़ गई है तो छुटभैयों के अलावा दूसरे लोग अब उनके पीछे-पीछे रहते हैं। दिल्ली में जिनका काम अटका है, वे चक्कर काट रहे हैं, सिफारिशें लगवा रहे हैं।
एक दिन सचिवालय के सामने एक साहब पीछे लग गए। नेताजी पुराने अनुभव को देखते हुए कन्नी काटने लगे। लेकिन साहब नहीं माने तो व्यंग्यात्मक लहजे में बोले, भाई दिल्ली तो दलालों की है और कार में बैठकर चल दिए।
नंबर बढ़ जाएंगे, काल कर दो
एक राष्ट्रीय पार्टी का इन दिनों सदस्यता ‘महाअभियान’ चल रहा है। नेताओं का दावा है कि पार्टी सदस्य संख्या का विश्व रिकार्ड बना लेगी। प्रदेश के नेता भी अपने क्षेत्र में सदस्यता संख्या अधिक रखकर ‘नंबर’ बनाना चाहते हैं। जगह-जगह शिविर लगा रहे हैं।
कई जगह लोग खुद आ रहे हैं, लेकिन जहां नहीं आ रहे वहां राहगीरों को ही पकड़ा जा रहा है। मोबाइल मांग अभियान के लिए पार्टी की ओर से जारी नंबर पर मिस काल की जा रही है। फोन लौटाकर नेताजी कह रहे हैं, ‘मैसेज आएगा, उस पर अपना नाम, पता और पूरा ब्योरा जरूर भरिएगा।’ जितनी मिस काल, नेताजी के उतने नंबर।
लोगों को क्या समझाएंगे?
प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत बैंक खाते तो लाखों खुल गए, लेकिन कुछ प्रावधान अब भी टेढ़ी खीर बने हुए हैं। एक प्रमुख बैंक के एक अधिकारी के नजदीकी का दो दिन पहले ही निधन हुआ। उन्होंने भी खाता खुलवाया था।
अधिकारी भी तीजे पर पहुंचे तो एक रिश्तेदार ने सवाल किया, ‘भाई साहब, खाताधारक के निधन पर तीस हजार रुपए का लाभ मिलना था?’ अधिकारी को खुद भी पता नहीं था तो साथी अधिकारी को फोन किया। जवाब मिला, ‘...यार दिखवाते हैं, बताते हैं....।’ कई दिन हो गए, कुछ नहीं दिखा। अब रिश्तेदार बैंक अधिकारी को ताना दे रहे हैं, आपको ही नियम नहीं पता तो लोगों को क्या समझाते होंगे?
हमें कौन पूछ रहा, कौन ले जा रहा
केरल में 31 जनवरी से राष्ट्रीय खेल शुरू हो रहे हैं। खेल विभाग के आला अधिकारियों का दल भी खेल गांव, आयोजन स्थलों को देखने जाने वाला है। एक वरिष्ठ खिलाड़ी ने अधिकारी की दुखती रग पर हाथ रख दिया, सर जी केरल तो जा रहे होंगे आप? अधिकारी बोले, ‘भाई हमें कौन पूछ रहा और कौन ले जा रहा।
बड़े लोग जाएंगे, हमारा नंबर ही कहां आ रहा। राष्ट्रीय खेल की जिम्मेदारी में भले आगे कर दिया, लेकिन जाते वक्त तो सब पीछे धकेल देते हैं।’ यह कहने के बाद ठंडी सांस भर अधिकारी दूर निकल गए।
क्या अब किलेबंदी से थमेंगे अपराध
दून पुलिस खुद तो अपराधों की रोकथाम में नाकाम है, तो क्या शहर की गलियों की किलेबंदी से अपराधियों की करतूत थम पाएगी? यह सवाल इन दिनों हर किसी की जुबां पर है।
दरअसल पुलिस ने इन दिनों चोरों के पीछे दौड़ने के बजाय पूरी ताकत पॉश कालोनियों और गलियों में गेट लगाने और चौकीदार तैनात करने में लगा दी है। थाना और चौकी प्रभारी अपने इलाकों में भ्रमण कर सोसायटी से जुडे़ पदाधिकारियों को तैयार करने में लगे हैं। हो भी क्यों ना, बॉस का जो आदेश है।
कुर्सी संभालते ही घोटाले पड़े
साहब सेहत महकमे से आते हैं। पिछली सरकार में कुंभ के दौरान जमकर ‘डुबकियां’ लगाई। मातहत भी जमकर नहाए-धोए। सरकार बदलते ही कुर्सी बनी रही, लेकिन कुछ समय से ग्रह खराब चल रहे हैं।
ऊपर तक पहुंच होने के बावजूद ऊपर वाले नाराज हैं। साहब की हालत ‘सिर मुंडाते ओले’ वाली हो गई है। नए-पुराने सारे गुनाह सामने आने लगे हैं। तभी तो साहब आजकल कहते फिर रहे हैं कुर्सी संभालते ही घोटाले गले पड़ने लगे हैं।
अंगूठे से पहले दिखाते हैं आंख
शहर के एक बड़े कालेज में अजब हाल है। गुरुजी सुबह अंगूठा लगाने आते हैं, लेकिन मशीन नहीं चलती। तनतनाते हुए गुरुजी बड़े साहब को फोन करते हैं, आंख दिखाते हैं कि जनाब ये फर्जी मशीन कहां से ले आए?
गुस्से को आरोपों में लपेटकर फेंकते हुए बड़बड़ाते हैं कि मशीन में घोटाला किया गया है। नकली मशीन लेकर आ गए और पैसा ज्यादा ले लिया। बड़े साहब चुप्पी साधने में ही भलाई समझते हैं। आखिर हाजिरी जो लगवानी है।
..जब नेताजी झांकने लगे बगलें
एक नेताजी पर इन दिनों पत्रकार वार्ता का जुनून सा सवार है। कैमरे और लाइटें देख नेताजी खूब गद्गद् होते हैं। एक बड़े मामले पर प्रेस वार्ता बुलाई और जमकर अपनी कामयाबी का बखान किया, लेकिन वे जवाब देने की तैयारी करके नहीं आए थे। एक पत्रकार ने सवाल पूछा तो नेताजी से कोई जवाब देते नहीं बना।
मातहत अधिकारी को जवाब देने का इशारा कर दिया। दूसरे पत्रकार ने सवाल दागा तो नेताजी लगे बगलें झांकने, अधिकारियों की ओर फिर उम्मीद भरी निगाहों से देखा। अधिकारी ने जवाब दिया तो नेताजी की जान में जान आई।
अभी खुश हैं, फिर उठानी पड़ेगी नाराजगी
शिक्षकों की तबादला नियमावली में स्कूलों के वर्गीकरण के लिए गठित समिति में शिक्षक नेताओं को शामिल किया गया है। इससे शिक्षक नेता बडे़ खुश हैं।
उनका कहना है कि उनकी मांग के अनुरूप स्कूलों के वर्गीकरण की कमेटी में उन्हें शामिल किया गया है, लेकिन शिक्षक नेता यह भूल गए कि यदि स्कूलों के वर्गीकरण में शिक्षकों की मन की न हुई तो शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों को शिक्षकों के भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।