उत्तराखंड कांग्रेस में दो नेताओं के बीच रिश्तें दो जिस्म एक जान वाले हैं। सरकार ने जाते-जाते उनकी फाइल पर हस्ताक्षर किए और मिल गई लाल बत्ती।
दोनों ही नेता इतने गुणवान हैं कि अध्यक्ष कोई हुआ इनका पप्पू फिट रहा। बेचारे अब दुविधा में माया लें कि राम। केंद्रीय नेतृत्व बारबार कह रहा है कि जो सरकार से उपकृत है उन्हें संगठन में पद न दें।
वहीं सालों की संगठनात्मक क्षमताओं की महारथ हासिल करने के बाद उसे भी छोड़ना नहीं चाहते। इधर-उधर कहते फिर रहे हैं माया को तो राम-राम आज कर दें मिला ही क्या है सरकार से।
एक की चिंता है प्रबंधन के मसले पर कोई पूछता तक नहीं तो दूसरा छोटी-छोटी बात पर आंदोलन का उतारु हो जाता है। नियमों में बंधे नए अध्यक्ष की मुसीबत है इस जुगल जोड़ी का क्या करें।