देहरादून के अच्छे व्यवसायी हैं। तकरीबन हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में नजर आ जाते हैं। पढ़े-लिखे हैं।
अपने कारोबार के साथ अन्य व्यवसायों की भी अच्छी समझ है। समस्या तब खड़ी होती है, जब वह दूसरे व्यवसायों की जानकारी वर्षों से उन्हें चला रहे अनुभवियों को देना शुरू करते हैं। आत्म मुग्धता में भूल जाते हैं कि दूसरों का समय कितना कीमती है।
आलम यह है कि लोग उनसे बचकर निकलने में भला समझते हैं। ताजा मामला परेड ग्राउंड में लगे वाइब्रेंट उत्तराखंड ट्रेड फेयर का है। यहां महाशय पहुंच गए और लगे विभिन्न स्टालों पर अपनी विद्वता का बखान करने। स्टाल लगाने वाले तो उन्हें देखते इधर-उधर हो लिए, लेकिन कर्मचारी हत्थे चढ़ गए।
कर्मचारियों ने पहले 5-10 मिनट तो उन्हें झेला, फिर मालिक के ‘छिपने की जगह’ दिखाते हुए धीरे से बोले कि सर, आपको याद कर रहे थे। अभी उधर गए हैं। और खुद के काम में लगे होने का दिखावा करने लगे।
कर्मचारियों का अनमनापन भांप महाशय ‘अच्छा, वहीं मिल लेता हूं...’ कह उदास भाव से आगे कदम बढ़ गए। लेकिन उनकी आंखें ‘दूसरे शिकार’ को तलाशती रहीं।