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राजनेताओं के कारनामे पढ़कर लोटपोट हो जाएंगे आप

Mon, 19 Jan 2015 04:55 PM IST
अनूप वाजपेयी/ अमर उजाला, देहरादून
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आज अमर उजाला आपको सियासी गपशप के जरिए नेताओं की कारस्तानी बताएगा। जानने के लिए पढ़ें...
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उत्तराखंड के राज्यपाल के तबादले के बाद से राजभवन में हर स्तर पर सफाई चल रही है। सालों से जमे पसंदीदा अधिकारी जा चुके हैं। नई ताजगी और सकारात्मक ऊर्जा भरने के लिए हवन-पूजन पहले ही हो चुका है।

इन दिनों राजभवन की दीवारें चमकाई जा रही हैं। सुना है नए राज्यपाल को बिजली के दिखाई देने वाले स्विच अच्छे नहीं लगते। लिहाजा उन्होंने इंजीनियर साहब को बुलाकर हल्का सा झटका दिया।
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पुरानी आदत के चलते बेचारे तार्किक हो रहे थे कि ये कैसे संभव होगा सर। जब इंजीनियर साहब को राष्ट्रपति भवन के सैकड़ों कमरों में एक भी स्विच न दिखने का उदाहरण दिया गया तो जाकर बात समझ में आई। अब इंजीनियर साहब कहते घूम रहे हैं कि अब राजभवन की दीवारें बोल उठेंगी।

ऐसे हैं प्रतिभावान नेता
प्रतिभावान नेताओं के बारे में तो सुना होगा, लेकिन देहरादून में एक नेता ऐसे हैं जिनकी पहचान प्रतिभावान नेता के रूप में होती है। राज्य की सभी राजनैतिक पार्टियों में रहने का तजुर्बा भी उन्हें हासिल है।

ये राज कम ही लोग जानते हैं कि प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में लगी राजीव गांधी की प्रतिमा आखिर बनवाई किसने थी। राजदारों में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और उनके एक दोचिंटुओं को ही पता है। नेता जी की अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ है, अपनी पार्टी में पहचान भी बन गई है।

कभी उनकी तमन्ना थी कि राजीव गांधी की जो मूर्ति उन्होंने सम्मान के साथ बनवाई है उसे भव्य कार्यक्रम में स्थापित करें, लेकिन कुछ कांग्रेसियों ने ही ऐसा होने नहीं दिया। ऐसा हो जाता तो वे भी आज कांग्रेसी कहलाते।

सिपाही का तबादला, मंत्री आग बबूला
देहरादून के एक कांस्टेबल का तबादला क्या हुआ कि बौखलाए मंत्री मुख्यमंत्री दरबार जा पहुंचे। मंत्री का दर्द समझ रहे सीएम ने विभाग के मुखिया को वहीं बुलवा लिया। मंत्री मुखिया पर बरस पड़े। बोले, तुमने तबादला कैसे कर दिया। मुखिया बोले उसका समय हो गया था।

आपा खो बैठे मंत्री बोले, उसे वहीं वापस करो, अफसर ने मर्यादित ढंग से इंकार कर दिया। मंत्री फट पड़े, मेरी तौहीन कर रहे हैं, वो महिला कांस्टेबल मेरे गांव के प्रधान की रिश्तेदार है। तबादला निरस्त नहीं हुआ तो मैं चुनाव हार जाऊंगा।

सीएम फाइलें निपटाते हुए दोनों के बीच चल रहे संवाद सुन रहे थे। उन्होंने अफसर से कहा मंत्री जी कह रहे हैं तो बात मान जाओ और मंत्री को नसीहत दी कि क्या राजनीति करते हो, एक सिपाही के तबादले से चुनाव हारने की नौबत आ गई?

मुखिया का नहीं, अगली सरकार का बीमा
कौन राजनेता नहीं चाहेगा कि उसकी सरकार सुरक्षित रहे यानि उसका बीमा हो और जनता वोट के माध्यम से उसकी पॉलिसी का प्रीमियम भरती रहे। बस इन दिनों मुखिया की इसी चाहत को परवान चढ़ाने का काम चल रहा है।

सीएम स्वास्थ्य बीमा योजना को मुखिया बीते साल स्वतंत्रता दिवस पर लांच करना चाहते थे फिर गणतंत्र दिवस और अब पहली अप्रैल का मुहूर्त निकला है। डेढ़ लाख तक का इलाज देने की बात अब 50 हजार में सिमट गई है और अब न तो कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा और न ही इनकम टैक्स देने वाले को।
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इसके अलावा जो लोग शेष रहते हैं, उनके बीमा का प्रीमियम सरकार देगी। इस योजना को लेकर एक अधिकारी का कहना था कि योजना का नाम सीएम स्वास्थ्य बीमा न होकर अगली सरकार का बीमा होना चाहिए।
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