कभी जिस पद को छोटे हाकिम कोसते थे, अब उस पद का इंतजार कर रहे हैं। जब छोटे हाकिम इस पद पर थे तो कहते थे कि यहां सिर्फ बवाल ही है।
जो आता है किसी न किसी मंत्री से फोन पर बात कराने लगता है। दिमाग पक गया है। यह बात किसी ने हाकिम तक पहुंचा दी। उन्हें इस पद से निजात मिल गई। लेकिन दो-तीन महीने ही गुजरें उन्हें इस पद की याद आने लगी है।
उनके जिन मुवक्किलों का काम अटका है वे आते हैं और कहते हैं कि आप थे तो उस कार्यालय में ‘रामराज्य’ था। छोटे हाकिम कहते हैं कि बस तबादले की सूची आ जाए। मैं फिर वहीं आऊंगा। सबका काम होगा। फर्जी रजिस्ट्री कराए घूम रहे कुछ चाटुकार मुवक्किल कहने लगते हैं कि कहें तो प्रदेश मुखिया से बात करूं। छोटे हाकिम मुस्कराने लगते हैं कि इतना बड़ा काम नहीं है।
हम नहीं तो वे भी नहीं
शिक्षा विभाग में एक संगठन इन दिनों विभाग पर पदोन्नति संशोधन के लिए दबाव बनाए हुए है। माना जा रहा है कि दबाव के चलते हाल ही में 96 शिक्षकों के पदोन्नति संशोधन के आदेश को निरस्त किया गया।
इस संगठन का कहना है कि पदोन्नति संशोधित नहीं करने के स्पष्ट आदेश के बावजूद शिक्षकों की बड़े पैमाने पर पदोन्नति संशोधित कर दी गई, जबकि उनके संशोधनों की अनदेखी की जा रही है।
...हमारा भी कार्ड बना है क्या?
मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना (एमएसबीवाई) के कार्ड क्या बने, दफ्तरों से लेकर नेता जी के दरबार तक हर तरफ अफरातफरी और उत्सुकता का आलम है। मुख्यमंत्री की मनपसंद योजना होने की वजह से इसे प्रभावी ढंग से लागू करने का स्वास्थ्य विभाग पर जिम्मा था।
लेकिन योजना शुरू हुए अभी कुछ दिन ही बीते थे कि सब किरकिरा हो गया। बनाने थे गरीबों के कार्ड और बन गए डॉक्टरों-अफसरों के। विभाग कभी आशाओं, कभी मातहत अधिकारियों तो कभी इंश्योरेंस कंपनी को जिम्मेवार ठहरा रहा है।
अपात्र के कार्ड क्या बने हैं, कई अफसर परेशान हैं। पता लगा कि साहब लोगों ने तो कार्ड बनाए ही नहीं थे। फिर कैसे बन गए? एक डाक्टर साहब ने तो पूछ ही लिया हमारा भी कार्ड बना है क्या?