किसी ने रास्ता तो ठीक दिखाया था, लेकिन सफर पूरा नहीं हो सका। वैसे भी अपने मियां जी ठहरे पुराने खलीफा। सालों साल बहनजी से रिश्ता खूब निभाया।
पिछले दिनों एक संकट में क्या फंसे कि रसूखदार लोग उनका गरीब की जोरू जैसा हाल करने पर उतारू हो गए। मियां जी अंदर ही अंदर घुटते रहे, मुकदमे अलग से लगा दिए गए, अशर्फियां गई वो अलग और ऊपर से सल्तनत का दबाव। दबाव यही था कि अपने हल्के को मौजूदा निजाम की सल्तनत में मर्ज कर दो।
मियां जी कई दिनों तक सोचते रहे कि क्या किया जाए, इसी बीच पुराने रसूख याद आए तो रास्ता भी मिल गया। बस फिर क्या था घर वापसी की घोषणा हो गई तो रियासत के लंबरदारों के होश फाख्ता हो गए।