उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में जवान बेटे को खोने के बाद बुढ़ापे में पेंशन भी कुंदन सिंह और मंगला देवी के गुजारे का सहारा नहीं बन पा रही है।
राज्य निर्माण की लड़ाई में सबसे कम उम्र (22 साल) का आंदोलनकारी और परिवार का इकलौता बेटा रविंद्र रावत शहीद हो गया था। उसकी शहादत के कुछ समय बाद राज्य निर्माण का सपना तो साकार हो गया, लेकिन मानो कुंदन सिंह के बुढ़ापे की लाठी टूट गई।
नेहरू कॉलोनी निवासी रवींद्र के पिता कुदंन सिंह, मां मंगला देवी और दो छोटी बहनों की उम्मीद तब जगी जब 13 दिसंबर 2011 को सरकार ने राज्य निर्माण के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारियों के परिवार में किसी एक को पेंशन देने की घोषणा की। लेकिन तीन साल बाद भी घोषणा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।
बेटियों की शादी के बाद 70 वर्षीय कुंदन सिंह और 60 वर्षीय पत्नी मंगला रावत अकेले रहते हैं। दोनों आज भी पेंशन की उम्मीद लगाए बैठे हैं। रवींद्र की मां मंगला देवी कहती हैं कि जिस राज्य के निर्माण के लिए मेरे बेटे ने अपना बलिदान दिया आज वह राज्य उसके माता पिता को क्या दे रहा है? कहा कि हमने अपने बुढ़ापे की लाठी को राज्य के लिए खो दिया। अगर बेटा जीवित होता तो हमारा बुढ़ापा सुख-शांति से गुजरता।
ऐसे कई परिवार है जिन्होंने राज्य निर्माण की लड़ाई में अपना बेटा, भाई, बहन, पति आदि को खोया है। तमाम आंदोलनकारी संगठन के लोगों का कहना है कि आंदोलनकारियों के नाम पर सरकार ने कई कोरी घोषणाएं करके उनके परिवार की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।
पेंशन के नाम पर छलावा...
आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार ने पेंशन लगाने के नाम पर आंदोलनकारियों के साथ छलावा किया है। सरकार द्वारा लगभग चार सौ आंदोलनकारियों को पेंशन दी जा रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जिन्हें पेंशन मिलती है उनमें भी किसी को छह महीने तो किसी को साल पर से पेंशन नहीं मिली है।