उत्तराखंड वन महकमे के एक अधिकारी लंबे समय से जंगलों के चक्कर काटते-काटते अजीब सी बातें करने लगे हैं।
गुलदार आए तो उनका जवाब होता है कि उसका काम तो आना ही है। जानवर घायल हो जाए तो बोलते हैं कि परेशान करेगा तो ऐसा ही होगा। कई बार तो हद दर्जे की बात कर जाते हैं।
एक दिन बड़े अधिकारी ने जानवर की मौत पर सवाल किया, वह पहचान नहीं पाए, तपाक से बोले- उसकी किस्मत में मौत ही लिखी थी। अधिकारी बिगड़े तो साहब को पता चला कि बॉस लाइन पर थे। तुरंत बैकफुट पर आए, माफी मांगी तो जान छूटी।
कागज की भी नब्ज टटोल रहे डॉक्टर साहब
स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों डॉक्टरों के बीच घपले घोटालों पर एक दूसरे के खिलाफ अंदरखाने खूब आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। कोई कहता है साहब गलत फंस गए। कागजों में गलती से साहब के साइन करा दिए।
कुछ यह कहते हैं कि कर्मचारी की क्या मजाल जो अधिकारी की बिना शह के पत्ता भी हिला दे। बहरहाल जिन लोगों ने डाक्टरी के बजाय कुर्सी तोड़ी है अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। ये कहते हैं कि मरीज के बजाए कागज की नब्ज टटोलना जरूरी हो गया। न जाने कब कौन मातहत हमसे गलत कागज पर ‘चिड़िया’ बैठवा दे।
‘भइया’ की तहजीब तो देखो
राष्ट्रीय पार्टी एक वरिष्ठ नेता जो राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त भी हैं और पार्टी से जुड़े संगठन के पदाधिकारी भी आजकल नया शिगूफा लाए हैं। शिगूफे के संबंध में खूब बयान दे रहे हैं। हुआ यह था कि वह दिल्ली पार्टी बैठक में गए थे।
किसी के हाथ से कागज का एक टुकड़ा गिर गया। वहां मौजूद पार्टी के उपाध्यक्ष ‘भइया’ ने कागज उठाया और उस व्यक्ति को दे दिया। बस इसी राई का नेताजी पहाड़ बना रहे हैं। कहते हैं यह ‘भइया’ का जमीनी स्वरूप है। उनकी तहजीब है कि पार्टी केलोगों का कितना सम्मान करते हैं।
यह दृश्य देखकर वह बिल्कुल आश्वस्त हो गए कि ‘भइया’ बदल चुकेहैं। उनके अंदर जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। इसमें उनका पैतृक संस्कार दिखा है। उनके अंदर प्रधानमंत्रित्व से गुण प्रतिबिंबित होने लगे हैं। अब उनके हाथों में पार्टी और देश आ जाए तो सुरक्षित रहेगा।