उत्तराखंड के कर्मचारी आजकल सूबे के हाकिम की तारीफ कर रहे हैं। कहते हैं कि हाकिम ने क्या दांव मारा सब चारों खाने चित हो गए। इसके बाद खिसियानी बिल्ली की तरह हंसते हैं।
उनके पास हड़ताल की काट भी है
अचानक गंभीर हो जाते हैं और कहते हैं कि आपस में बंटने का यही नतीजा है। एक-एक करके सारे संगठनों की हड़ताल का काम लगा दिया। फिर एक कर्मचारी संगठन का पदाधिकारी एक्सपर्ट कमेंट देता है- सूबे के मुखिया हैं पुराने खिलाड़ी। दूसरी सरकारों में हड़ताल करवा देते थे। उनके पास हड़ताल की काट भी तो है।
दरअसल हड़ताल खत्म होने के इतने दिनों के बाद कर्मचारियों को सूबे की मुखिया की याद इसलिए आ रही है कि अभी तक हड़ताल के दिनों का कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। वे मुख्य सचिव को खत लिखते हैं तो कोई जवाब नहीं आता और सूबे के मुखिया से मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
मुखिया जी भी सियासत के माहिर हैं जानते हैं कि कर्मचारी हड़ताली वेतन की मांग लेकर आएंगे। वह हर कार्यक्रम में किसी न किसी बहाने हड़ताली कर्मचारियों को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
कुछ दिन पहले कर्मचारियों ने दो घंटे सुबह कार्य बहिष्कार की रणनीति बनाई थी लेकिन उसकी भी हवा निकल गई। कर्मचारी कहते हैं कि लगता है कि सूबे के मुखिया ने सपा मुखिया से घोड़ा पछाड़