देवभूमि उत्तराखंड के चंपावत जिले में देवी मां और अन्य देवता जंगल बचा रहे हैं। ऐसा हो रहा है जंगलों को देवी-देवताओं को समर्पित करके। इस दौरान न तो इन जंगलों से वनस्पति का दोहन होता है और न ही चुगान।
बीते एक साल में 6 वन पंचायतें यह मुहिम चला चुकी हैं। जंगलों को देवी मां को समर्पित करने से अवैध कटान पर रोक लगी है। जंगल फले-फूले हैं।
चंपावत वन प्रभाग के तहत 65980.12 हेक्टेयर आरक्षित, 34375.95 सिविल और 22815.70 हेक्टेयर पंचायती वन हैं। जिले में वनों को बचाने के लिए मार्च, 2014 से वन पंचायत के जंगलों को देवी-देवताओं के मंदिर को समर्पित करने की परंपरा शुरू हुई है। इस अवधि में 6 गांवों के जंगलों को मंदिरों को समर्पित किया जा चुका है।
जंगल बचाने का यह आइडिया कर रहा काम
इन इलाकों में दो से पांच साल तक के लिए जंगलों को मां हिंग्लादेवी, इंसाफ के देव गोरलदेव, नागनाथ देव, भगवती देवी को समर्पित किया गया। सेलाखोला, छतकोट, खर्ककार्की, बाजरीकोट, चौकी, कोट अमोड़ी के जंगल देवी-देवताओं को सौंप सुरक्षा की गुहार लगाई गई।
देवी दरबार में दस्तक देने के बाद वन पंचायत और ग्रामीणों ने दो से पांच वर्षों तक जंगल से किसी भी प्रकार की वनस्पति का दोहन नहीं करने का संकल्प लिया। साथ ही, चुगान न किए जाने का भी। ग्रामीण केवल पेड़ से गिरने वाली सूखी पत्तियों और लकड़ियों को ही उपयोग में ला सकेंगे।
नागरिकों की मान्यता है कि एक बार समर्पित कर देने के बाद इस जंगल से किसी भी चीज का दोहन करने से देवी-देवता के कोप का भाजन बनना पड़ता है। रेंजर एमएम भट्ट का भी मानना है कि ये प्रवृत्ति वनों को बचाने में मददगार हो रही है।