भूतिया गांव (घोस्ट विलेज) में इस बार एक-दो नहीं, गांव में पूरे दौ सौ से अधिक लोग नाचते दिखे। भूतिया गांव (घोस्ट विलेज) घोषित हो चुके सौड़ गांव के खलिहान में इस बार बहार थी, एक-दो नहीं, गांव में पूरे दौ सौ से अधिक लोग जुटे थे।
गाना-बजाना, पहाड़ी खाना, मिलना-मिलाना सब कुछ था। आप सोच रहे होंगे, जरूर कोई शादी-विवाह का कार्यक्रम रहा होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। यहां आयोजित किया गया था घोस्ट विलेज फेस्टिवल। ...और इसका श्रेय जाता है प्रोजेक्ट फ्यूल के फाउंडर दीपक रमोला को, जिन्होंने स्वयंसेवी संस्था हंस फाउंडेशन की मदद से ये अनोखा फेस्टिवल आयोजित किया था।
अनोखा इस मायने में कि उत्तराखंड के खाली होते गांवों की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा जाए। कुछ ऐसा हो कि लोग भले ही स्थायी रूप से यहां न रहें, लेकिन अपने पुस्तैनी घरों को यूं उजाड़ न छोड़ें। इनकी मरम्मत कराएं, समय-समय पर इन्हें संवारें।
छुट्टियों में बच्चों को लेकर घर आएं और कुछ दिन ही सही, गांव में समय बिताएं।मसूरी-चंबा-धनोल्टी मार्ग पर काणाताल के पास बसा है सौड़ गांव। पिछले दिनों यह गांव तब चर्चा में आया, जब मई-जून में प्रोजेक्ट फ्यूल के दीपक रमोला ने अपनी टीम के साथ अनोखे अंदाज में गांव के खाली पड़े घरों की वीरान दीवारों पर सुंदर कलाकृतियां उकेरीं।80 से 100 युवाओं की टीम पूरे एक माह तक इस काम में जुटी रही।
संस्कृति और सभ्यता को दीवारों पर उकेरा
Ghost Village Festival in uttarakhand
- फोटो : amar ujala
इन लोगों ने सुंदर चित्रों के माध्यम से गांव के जनजीवन के साथ यहां की संस्कृति और सभ्यता को भी बखूबी दीवारों पर उकेरा। ये चित्र इतने सुंदर थे कि दुनिया के कोने-कोने में बसे लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब रहे।
इसी उद्देश्य के साथ पिछले दिनों गांव में गोस्ट विलेज फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें पेंटिंग में भागीदारी करने वाले युवाओं के साथ श्रीलंका और देश के दूसरे हिस्सों से आए मेहमान सम्मिलित हुए। खास बात यह रही है कि इन तीन दिनों मेें इन लोगों ने पूरी तरह से गांव का जीवन जीया।
फेस्टिवल से ताजा हुई ‘थौल’ की याद
बेटी-ब्वारियों के लिए कभी गांव-गांव में विशेष तौर पर थौल (मेलों) का आयोजन किया जाता था। लेकिन समय के साथ अब ये लुप्त होते जा रहे हैं या इनका स्वरूप बदल गया है। घोस्ट विलेज फेस्टिवल के तहत थौल की याद को
ताजा किया गया। गांव में थौल का आयोजन किया गया। खास बात यह रही कि इस मेले में लगे हर स्टॉल पर ग्रामीण उत्पाद ही बिक्री के लिए रखे गए। खान-पान से लेकर हस्तशिल्प और सब कुछ स्थानीय था। ग्रामीणों के लिए यह सब कुछ अनोखा था, लेकिन महोत्सव को आजीविका से जोड़कर यह और भी खास बन गया।
मंच पर दिखी लोक संस्कृति की झलक
Ghost Village Festival in uttarakhand
गांव में तीन दिन तक चले इस महोत्सव की शाम खास रही। लोग खलियान में जुटे और पहाड़ी लोक-संगीत पर खूब थिरके। ढोल-दमाऊं की थाप पर मनांण में लोग देर तक नाचते रहे। रवि गुसांई और उनकी टीम ने पांडव नृत्य के साथ
नंदा राजजात की प्रस्तुति दी। संकल्प खैंतवाल और ग्रुप के भैरवा बैंड की प्रस्तुति ने तो लोगों को मुग्ध कर दिया। गांव की महिलाओं और बच्चों ने अपने अंदाज में लोक संस्कृति के गीत प्रस्तुत किए तो सुनने वाले तालियां ही बजाते रह गए।
उल्ख्यारी में ऐसे कूटा जाता है धान
मेहमानों ने गांव के जीवन को आत्मसात करने का भरपूर प्रयास किया। उल्ख्यारी में धान कूटना सीखा तो अरसे बनाने की कला और मिट्टी से घरों को लिपने के गुर भी सीखे। कुछ कलाकारों ने चीड़ के छितैंड़ों से ज्वैलरी बनाने की कला सिखाई तो कुछ ने बांस आदि से घर की सजावट का सामान बनाने का आसान तरीका बताया। इसके अलावा विलेज वॉक, कैंपिंग और ट्रैकिंग का भी आनंद उठाया।
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