राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के लिए पीजी कोर्स (एमडी/एमएस) की अनुमति मिलना आसान नहीं है। दरअसल, कॉलेज में यूजी (स्नातक) स्तर के संसाधन/फैकल्टी की कमी बनी हुई है। तीन साल पूर्व एमसीआई (भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद) ने जो आपत्तियां लगाई थी, उनका आज तक समाधान नहीं हुआ। ऐसे में संस्थान को स्नातक स्तर की मान्यता बचाने के लिए भी जूझना पड़ेगा।
वर्ष 2008 में श्रीनगर मेडिकल कॉलेज को एलओपी (लेटर ऑफ परमिशन) मिली थी। वर्ष 2013 में एमसीआई ने एमबीबीएस को मान्यता दे दी। अगले वर्ष यानी 2008 में एमबीबीएस मान्यता का नवीनीकरण होना है, जबकि इसी साल पीजी सीटों के लिए एमसीआई का दौरा होना है। दौरे से पूर्व इसी हफ्ते एमसीआई की तीन सदस्यीय टीम प्री-पीजी एसेसमेंट कर जा चुकी है। एमसीआई 2014 में भी पीजी सीटों की मान्यता के लिए निरीक्षण कर चुकी है।
तब भी काफी कमियों की वजह से सिर्फ एक ही विषय में पीजी मान्यता मिल पाई थी। एमसीआई ने जिन बिंदुओं पर आपत्तियां लगाई थी, वे बरकरार हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। हालात यह है कि कॉलेज में एमबीबीएस स्तर की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में कॉलेज को दोहरी चुनौतियों से जूझना होगा। संस्थान को पीजी स्तर की अनुमति लेने के साथ ही यूजी स्तर की मान्यता बचाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी।
यह है प्रमुख कमियां
फैकल्टी की कमी : कॉलेज में लगभग 30 फीसदी फैकल्टी की कमी है। कुछ प्रमुख विभागों में डॉक्टर न के बराबर हैं। एमसीआई 10 फीसदी नीचे फैकल्टी की कमी को स्वीकारता है।
ओपीडी : कॉलेज से सबंद्ध बेस अस्पताल की औसत ओपीडी 400 मरीज प्रतिदिन है। एमसीआई की गाइडलाइन के मुताबिक ओपीडी में रोजाना कम से कम 700 मरीजों का परीक्षण होना चाहिए।
बेड ऑक्यूपेंसी/आईपीडी: 500 बेड वाले बेस अस्पताल की बेड ऑक्यूपेंसी 40 फीसदी है, जो एमसीआई के मानकों के मुताबिक काफी कम है। मानकों के अनुसार 70 फीसदी बेड भरे होने चाहिए।
इंसिनेटर: बायो मेडिकल वेस्ट के निष्पादन के लिए अस्पताल में इंसिनेटर होना जरूरी है। यहां इंसिनेटर है, जो सालों से बंद पड़ा है।
रेडियोडायग्नोसिस : कॉलेज में रेडियोडायग्नोसिस विभाग खाली है। यहां रेडियोलॉजिस्ट के अभाव में अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन रिपोर्ट नहीं मिल पाती है। इससे मरीज और मेडिकल छात्र दोनों पर असर पड़ रहा है।
ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट : कॉलेज के ब्लड बैंक/पैथोलॉजी विभाग में ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट होनी चाहिए। यहां यूनिट के लिए मशीन हैं। एक कर्मचारी को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है, लेकिन आज तक यूनिट शुरू नहीं हो पाई।
क्या कहते हैं अधिकारी
फैकल्टी की नियुक्तियां की जा रही हैं। कमियों को भी दूर किया जा रहा है। एमसीआई को सभी डाटा उपलब्ध करा दिया गया है।
- प्रो.सीएमएस रावत प्राचार्य मेडिकल कॉलेज श्रीनगर
श्रीनगर में बेस अस्पताल की व्यवस्थाएं होंगी ऑन लाइन
राजकीय मेडिकल कॉलेज से संबद्ध बेस अस्पताल श्रीनगर को ऑटोमेशन मोड में लाने की कवायद चल रही है। ऑटोमेशन होने बाद अस्पताल की सारी व्यवस्थाओं का सेंट्रलाइजेशन हो जाएगा। एनआईसी के ई-हॉस्पिटल सॉफ्टवेयर के जरिए बेस अस्पताल ऑन लाइन हो जाएगा। यानि कि मरीज कहीं से भी रजिस्ट्रेशन कराने के साथ ही रिपोर्ट ले सकते हैं।
यहां बता दे कि सरकार की योजना के तहत अस्पतालों का ऑटोमेशन (स्वचालन) होना है। उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विभाग हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज का ऑटोमशन कर चुका है। अब श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में ऑटोमशन की कार्रवाई चल रही है। वर्तमान में श्रीनगर मेउकिल कॉलेज में ऑफ लाइन मोड में काम होता है।
संस्थान के प्राचार्य प्रो. सीएमएस रावत ने बताया कि कॉलेज और बेस अस्पताल की संपूर्ण व्यवस्थाओं को केंद्रीयकृत किया जाना है। अस्पताल की सारी सेवाओं की जानकारी और सूचनाएं ऑन लाइन होंगी। अस्पताल की ओपीडी, आईपीडी, रजिस्ट्रेशन, जांच प्रयोगशाला, इमरजेंसी सहित अन्य विभाग आपस में ऑन लाइन जुड़ेंगे। दो दिन पूर्व विभाग के नोडल अधिकारी चंद्रशेखर गुरुरानी मेडिकल कॉलेज व बेस अस्पताल का निरीक्षण करके जा चुके हैं।
अस्पतालों का ऑटोमेशन होने के बाद मरीज को चिकित्सक से अप्वाइमेंट लेने के लिए कतार में नहीं लगना पड़ेगा। मरीज ऑन लाइन अप्वाइमेंट लेगा। ऐसे ही मरीज को ऑन लाइन जॉच रिपोर्ट मिल जाएगी। ऑटोमेशन की प्रक्रिया के लिए जरुरतों का आकलन किया गया। ई-हॉस्पिटल सॉफ्टवेयर के जरिए मरीज के भर्ती होने से डिस्चार्ज तक का ब्यौरा ऑन लाइन रहेगा। चंद्रशेखर गुरुरानी, नोडल अधिकारी चिकित्सा शिक्षा विभाग उत्तराखंड