कम पानी और जंगली जानवरों से परेशान परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए जिरेनियम की खेती राहत देने वाली साबित हो सकती है। जिरेनियम कम पानी में आसानी से हो जाता है और इसे जंगली जानवरों से भी कोई नुकसान नहीं है।
इसके साथ ही नए तरीके की खेती ‘जिरेनियम’ से उन्हें परंपरागत फसलों की अपेक्षा ज्यादा फायदा भी मिल सकता है। खासकर पहाड़ का मौसम इसकी खेती के लिए बेहद अनुकूल है। यह छोटी जोतों में भी हो जाती है। जिरेनियम पौधे की पत्तियों और तने से सुगंधित तेल निकलता है। अगर एक बीघा में जिरेनियम की खेती की जाए, तो इससे करीब आठ हजार रुपए का फायदा किसान को हो सकता है।
जबकि एक बीघा में करीब पांच से छह हजार रुपए का ही गेहूं निकलता है। एक बीघा में एक किलोग्राम तेल निकलता है, इस तेल की बाजारी कीमत 10 हजार रुपये और लागत दो हजार रुपए आती है। पांच से छह महीने में ही इसकी फसल तैयार हो जाती है।
बदला खेती का तरीका तो बदल गया ‘नसीब’
देहरादून जिले में सहसपुर के किसान विकास शर्मा की मानें तो उन्हें जिरेनियम की खेती से काफी फायदा हो रहा है। बताया कि काफी पहले वे परंपरागत रूप से गेहूं, धान आदि की खेती किया करते थे, लेकिन इसमें लागत अधिक होने से उतना लाभ नहीं मिल पा रहा था।
करीब पांच साल से जिरेनियम की खेती की शुरूआत की, यह अन्य फसलों से अधिक लाभकारी साबित हुई है। बताया कि अब देखा देखी कुछ अन्य किसान भी इसकी खेती करने लगे हैं। बताते हैं कि कम पानी में भी हो जाने के चलते जिरेनियम की खेती धनोल्टी में भी फायदेमंद साबित हो रही है।
विदेशों में भी हो रही इसकी खेती
जिरेनियम का तेल पौधे के रसीले तनों एवं पत्तियों से वाष्प आसवन विधि द्वारा निकाला जाता है। इसके पौधे को रोज जिरेनियम के नाम से भी जाना जाता है। जिरेनियम की खेती मुख्य रूप से मिश्र, चीन, मेडागास्कर आदि में की जा रही है।