ज्यादातर एग्जिट पोल और राजनीतिक पंडितों ने असाधारण रूप से हुए मतदान और पब्लिक के रुख भांपने के बजाय हरिद्वार सीट पर कड़ा संघर्ष होने का दावा किया।
क्योंकि भविष्यवाणी करने वालो के जहन में इस सीट से मुख्यमंत्री की पत्नी चुनाव लड़ना रहा। मोदी की रैली में जुटी ग्रामीण इलाकों की भीड़ को देखने और मुजफ्फरनगर के सामप्रदायिक दंगे असर को सौहार्द में बदलने के बजाय नेता आंकड़ों की बाजीगरी करते रहे।
भाजपा के रमेश पोखरियाल निशंक के जब 1.72 लाख मतों से जीतने की घोषणा हुई उसी समय हरीश रावतपरिवार की छठवीं हार की इबारत भी लिखी गई।
कांग्रेस टिकटों की लड़ाई में फंसी
टिकट मिलते ही निशंक भूमिगत तरीके से चुनाव में जुट गए। नाराज मदन कौशिक को दिल्ली बुलाकर राजनाथ और वीएचपी के अशोक सिंघल ने भविष्य की गारंटी दे दी। भाजपा जब आधा चुनाव लड़ चुकी थी और कांग्रेस टिकटों की लड़ाई में फंसी रही।
उधर, सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ कर डेंट मारा। हरिद्वार संसदीय सीट के हॉट होने के कई कारण थे। सीएम हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत चुनाव मैदान में थी और दूसरे मुजफ्फरनगर के सटी होने के कारण हिन्दू-मुसलिम मतों के ध्रुवीकरण की संभावना थी।
सरकार ने हरिद्वार में बिगड़ी कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश नहीं की। 300 करोड़ रुपए के बकाया से गन्ना किसान नाराज था। और, हरीश सरकार पूरी बेफिक्री में मुगालते के साथ आगे बढ़ती गई।
देहाती भीड़ का आंकलन करने की कोशिश नहीं
नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी और मायावती ने इस सीट पर पूरा फोकस किया। लेकिन पब्लिक ने जैसे पहले ही तय कर लिया था। विरोधियों ने मोदी की रैली में जुटी धुर देहाती भीड़ का आंकलन करने की कोशिश नहीं की। मदन कौशिक पहले तो नाराज रहे लेकिन फिर जुट गए और उनकी सीट पर पार्टी प्रत्याशी ने 36 हजार की बढ़त ली।
ऐसा कोई प्रयोग शेष नहीं रहा जो कि मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी पत्नी रेणुका के लिए ना किया हो। देहरादून से मंगलौर तक कोई ऐसा कोई क्षत्रप नहीं बचा जिसे कांग्रेस में शामिल ना किया हो। बसपा के दो निलम्बित विधायक सुरेंद्र राकेश व हरिदास ने खुलकर कांग्रेस के लिए काम किया।
मुख्यमंत्री खुद लगे, सरकारी सिस्टम झोंक दिया गया, अथाह पैसा पानी बन गया लेकिन जीत हाथ से निकल गई। बम्पर मतदान के रुझान के बाद भी कांग्रेस अपने डूबते जहाज को नहीं देख सकी।