विश्व धरोहर ‘फूलों की घाटी’ में पाई जाने वाली फ्लोरा और फोना वनस्पतियों का जीन पूल तैयार किया जाएगा। पूल तैयार करने का मकसद अति दुर्लभ वनस्पतियों का संरक्षण और संवर्द्धन है। वन अनुसंधान केंद्र ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी है। इस बाबत फूलों की घाटी के बराबर ऊंचाई पर भूमि की तलाश की जा रही है।
गढ़वाल मंडल के चमोली जिले में हिमालय की तलहटी में फूलों की घाटी पाई जाती है। सरकारी अध्ययन के मुताबिक यहां 525 वनस्पतियां हैं, इनमें 90 फीसदी से ज्यादा फूलों की हैं। सूत्रों की मानें तो एक ताजा अध्ययन के मुताबिक 700 वनस्पतियां हैं हालांकि यह अध्ययन अभी प्रकाशित नहीं हो सका है। बेहद कम आकार में सैकड़ों फूलों की वनस्पतियां पाए जाने की वजह से यूनेस्को ने फूलों की घाटी को विश्व धरोहर का दर्जा दिया है।
इस घाटी में राज्य पुष्प ब्रह्म कमल, मल्टी स्टोरी फ्लावर, पॉपी, हिमालयन सेंट फ्लावर वगैरह पाए जाते हैं जो अति दुर्लभ की श्रेणी में हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो फूलों की घाटी के अलावा ये वनस्पतियां अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती हैं। वन अनुसंधान केंद्र अब इन वनस्पतियों के जीन पूल बनाने की तैयारी कर रहा है।
इस बाबत वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी फूलों की घाटी के आसपास के क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं ताकि जीन पूल के लिए भूमि की तलाशी जा सकेगी। वन अनुसंधान का मानना है कि बेशक फूलों की घाटी में सैकड़ों वनस्पतियां हैं लेकिन अगर प्राकृतिक आपदा, बीमारी फैलने पर ये वनस्पतियां नष्ट हो गई तो दोबारा उनको बनाना असंभव होगा। इसी के मद्देनजर जीन पूल तैयार किया जा रहा है।
बब्बर शेर से लिया सबक
गुजरात के गीर नेशनल पार्क में बब्बर शेर पाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला दिया था कि बब्बर शेर अति दुर्लभ वन्य जीव है अगर बीमारी या आपदा में बब्बर शेर खत्म होते है तो प्रजाति विलुप्त हो जाएगी। इसलिए बब्बर शेरों को बचाने के लिए मप्र के बूरी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में भी इसको संरक्षित किया जाए ताकि यह प्रजाति विलुप्त नहीं हो। इस फैसले से सबक लेते हुए वन अनुसंधान केंद्र फूलों की घाटी में पाई जाने वाली वनस्पतियों का जीन पूल तैयार कर रहा है।
फूलों की घाटी में पाई जाने वाली दुर्लभ वनस्पतियों का जीन पूल तैयार किया जाएगा। ताकि किसी भी किस्म की आपदा, बीमारी में ये वनस्पतियां विलुप्त नहीं हो जाए। इस बाबत दौरा किया जा रहा है जल्द ही पूल के लिए भूमि का चयन हो जाएगा।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी