राजधानी दून में कूड़े का कुनबा बढ़ता जा रहा है। कचरे के कुनबे में कई नई तरह की चीजें बढ़ गई हैं। लेकिन नियमावली के अभाव में इन्हें कायदे से डिफाइन नहीं किया जा पा रहा है।
उत्तराखंड शासन ने 2013 में नया एक्ट प्लास्टिक रूल्स तो बना दिया लेकिन नोटिफिकेशन न होने से नियमावली नहीं बन पाई। इस वजह से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
पॉलीथिन और दूसरे कचरे के मामले में कोई कार्रवाई नगरीय ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं हटालन-2000 के तहत कार्रवाई की जाती है।
लेकिन जब यह कानून बना तब से अब तक घर और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कई तरह के कचरे बढ़ गए हैं।
बड़ी मात्रा में कचरे का हिस्सा
इनमें टेटरा पैक, थर्मोकोल, पैकेजिंग मेटेरियल, बिल्डिंग मेटेरियल, यूज एंड थ्रो वाली वस्तुएं हैं। यहां तक की अब पेन, घड़ी, डाइपर, हाईजीन नैपकिंस भी बड़ी मात्रा में कचरे का हिस्सा बन गई हैं।
इनमें कुछ कचरा तो बायोडिग्रेडिबल है और कुछ नॉन बायोडिग्रेडिबल। इसी कचरे में कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो आधी बायोडिग्रेडिबल और आधी नॉन बायोडिग्रेडिबल।
इसमें हाईजीन नैपकिंस, डाइपर आदि चीजें आती हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन चीजों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटने कोशिश तो की है लेकिन हकीकत में ये मेटेरियल कायदे से डिफाइन नहीं हो पाए। इसके लिए बोर्ड प्लास्टिक रूल्स-2013 के नोटिफिकेशन का इंतजार है। नोटिफिकेशन के बाद नए कचरे की श्रेणी तय हो पाएगी।
दस सालों में कई तरह के कचरे बढ़ गए हैं। केंद्र सरकार ने प्लास्टिक रूल्स पहले ही बना दिया था। उत्तराखंड में भी प्लास्टिक रूल्स 2013 पास हो गया है। लेकिन अभी नोटिफिकेशन नहीं हुआ। नोटिफिकेशन होने के बाद नियमावली बनेगी।
-अमरजीत ओबेराय, पर्यावरण अधिकारी
हम चाहते हैं कि कचरे को व्यक्ति के दरवाजे पर ही अलग-अलग कर दिया जाए। इससे आसानी रहेगी। बायोडिग्रेडिबल और नॉन बायोडिग्रेडिबल कचरा शुरू से ही अलग हो जाए। ऐसा ही सिस्टम तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
-हरक सिंह रावत, मुख्यनगर अधिकारी
जब तक लोग किचन सेंसिटिव नहीं होते सूखे और गीले कचरे को अलग करना बहुत मुश्किल होगा। इसके लिए लोगों को जागरुक होने की जरूरत है। किचन के बाहर आने पर कचरे को अलग कर पाना बहुत मुश्किल होता है।
-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड