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देखिए, उत्तराखंड की पहचान बचाने की मुहिम

Fri, 16 Oct 2015 12:36 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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प्रदेश भर के 800 गावों का भ्रमण कर बीस दिन बाद गांव बचाओ यात्रा दून के गांधी पार्क आकर समाप्त हो गई। यात्रा के आखिरी पड़ाव में सचिवालय के पास यात्रियों और पुलिस में भिड़ंत होते-होते बची। निर्धारित कार्यक्रम के तहत जब यात्रा सचिवालय के पास पहुंची तो उनको प्रतीकात्मक प्रदर्शन से पुलिस ने रोक दिया। इससे गुस्साए लोगों ने मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
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माहौल गरमाया तो पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी सचिवालय के समक्ष दीवार पर खड़े होकर सत्ताधारियों को ललकारने लगे। कहा कि यह सरकार समतावादियों व गांधीवादियों का संवैधानिक अधिकार तक छीनने में लगी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के गांवों में गुस्सा, गम, निराशा, हताशा का महासमुद्र बह रहा है।

लोगों में दोनों राजनीतिक दलों और नौकरशाही के प्रति बहुत उग्र घृणा है। ये लोग धन व छल के कारण सत्ता में हैं। इसलिए लोगों में व्यवस्था के प्रति अविश्वास चरम पर पहुंच चुका है।
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बदतर हैं गढ़वाल के गांवों में हालात

मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रति असीम गुस्सा और निराशा है। शराब और खनन ने कुमाऊं को तबाह कर दिया है। उन्होंने कहा कि गढ़वाल के गांवों में भी हालात बदतर हैं। पलायन, बेरोजगारी, गरीबी और बुनियादी सुविधा विहीन हो चुके हैं गांव।

उत्तराखंड में बड़ा विस्फोट होने को है और इसके लिए राजनीतिक दल व नौकरशाह जिम्मेदार होंगे। महिलाएं कालरात्रि बनकर सत्ता व सत्ता के स्वरूप को बदल देंगे। इसके बाद यात्रा गांधी पार्क पहुंची।

इसमें डॉ. राकेश, कुमार, डॉ. किरण रावत, सुशीला भंडारी, द्वारिका सेमवाल, पीडी गुप्ता, डॉ. आर डिमरी, कर्नल डिमरी, जेपी मैठाणी, डॉ. हिमानी पुरोहित, शालिनी नेगी, विनोद सिंह खाती, मुन्ना राणा, रमेश यादव, मनमोहन नेगी समेत सैंकड़ों की तादाद में लोग शामिल थे।
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आठ सौ से ज्यादा गांवों से गुजरी यात्रा

गांव बचाओ यात्रा आठ सौ से ज्यादा गांवों में पहुंची। इसने तेरह जिले व 56 ब्लॉक को छुआ। 25 हजार से अधिक लोगों से मुलाकात कर उनके विचार जाने गए। प्रदेश भर में लोग व्यवस्था से उकता चुके हैं। उनका कहना है कि पानी छीन लिया और शराब दे दी। खेती बाड़ी बरबाद कर खनन कर दिया।

शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, पानी, सुरक्षा और पर्यावरण का नाश कर दिया गया है। स्थानीयता को खत्म कर पूंजीपतियों और धनिकों को संसाधन सौंपे दिए जा रहे हैं। गांवों में परिवर्तन का इंतजार है।

राजनीतिक बदलाव की भी आहट
यात्रा में शामिल सभी लोग यह कहते हैं कि अब परिवर्तन राजनीति में भी होगा। भले ही इंकलाबी व संघर्षवादी लोग बिना दल के चुनाव लड़ें। लेकिन अब लोग दोनों ही दलों से बहुत निराश हैं। वे अब खुद बदलाव करने को आतुर हैं। इसलिए जुनूनी लोग मुद्दों को लेकर चुनाव भी लड़ सकते हैं।
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