हिंदुस्तान और पाकिस्तान में भले ही बंटवारा हो गया हो, मगर दोनों देशों में रहने वालों के दिलों के तार आज भी जुड़े हुए हैं।
पाकिस्तान के सरदार मोहम्मद आज भी चिट्ठी भेजकर काशीपुर में रहने वाले अपने दोस्त करतार सिंह नरूला का हालचाल जानना नहीं भूलते। यह अलग बात है कि दोनों ने पिछले 68 वर्ष से एक दूसरे को देखा तक नहीं।
वर्ष 1947 में पाकिस्तान से आए करतार सिंह (86) बताते हैं कि जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब वह 11वीं के छात्र थे। वह गुजरात (पाकिस्तान) के जमीदारा कॉलेज में पढ़ते थे। उस वक्त वह पाकिस्तान के गांव शेखपुर में रहते थे और जोगीवाला ठेरा में उनकी जमीन थी।
वहां उनका परिवार खेतीबाड़ी करता था। आजादी के समय मची अफरा-तफरी के बीच उनके दोस्त सरदार मोहम्मद ने उनका बहुत साथ दिया। बंटवारे के समय जब वह भारत आ रहे थे, तब उन्होंने दो दिन एक गन्ने के खेत में छिपकर भूखे-प्यासे दिन गुजारे। उनके मित्र सरदार मोहम्मद ने कहा कि आपको मैं कैंप तक सुरक्षित ले चलता हूं।
वह साथ में चले तो कुछ लोगों ने भाले और कुल्हाड़ी से हमला बोल दिया। इसके बाद वह सरदार मोहम्मद की बहन के घर में छिपे, जहां से उन्होंने अंधेरे में शरणार्थी कैंप तक उन्हें छोड़ा।
करतार सिंह बताते हैं कि अटारी, कुरुक्षेत्र होते हुए वह काशीपुर आ गए। यहां पर उन्होंने शुगर मिल के टाइम आफिस, कैन आफिस और जनरल स्टोर में नौकरी की और परिवार का भरण पोषण किया।
उनका दोस्त सरदार मोहम्मद उन्हें बहुत याद करता है। आज भी पाकिस्तान से चिट्ठी भेजकर हाल चाल लेता रहता है। उन्होंने भी बीते महीने ईद-उल-फितर की मुबारकबाद अपने दोस्त को दी थी।