देहरादून स्थित एफआरआई में अफसरों के बंगलों के बाहर 'कालकोठरियां' बनी हैं जो मासूम जिंदगियां निगल रही हैं।
गुलदार के हमले का शिकार हुई 17 साल की समीक्षा राणा माता-पिता और बहनों संग वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के जिस नौ नंबर बंगले के ‘आउटडोर हाउस’ में रहती थी, वह किसी कालकोठरी से कम नहीं है।
साहबों के बंगले जहां रात के वक्त हजारों वाट के बल्बों की रोशनी से जगमग करते हैं, वहीं समीक्षा के घर के बाहर शाम ढलते ही घुप अंधेरा छा जाता है। सिर्फ समीक्षा नहीं, संस्थान में अधिकारियों के बंगलों के बाहर रहने वाले निचले स्तर के कर्मचारियों के ‘घरों’ का यही हाल है।
हर बंगले के बाहर सौ मीटर की दूरी पर बने इन आउटडोर आवासों में रहने वाले कर्मचारियों के लिए शौचालय भी जंगल में बनाए गए हैं। ऐसे में अंधेरा, घनी झाड़ियां और उनमें छुपे गुलदारों का खतरा हर वक्त इन कर्र्मचारियों और उनके परिजनों पर मंडराता है।
औने-पौने दाम पर लेते हैं दूध
एक कर्मचारी ने बताया कि आउटडोर आवासों में रहने वाले कर्मचारी गायें पालते हैं। दूध बंगले में रहने वाले अधिकारी ही लेते हैं। लेकिन शहर में जहां दूध 40 से 60 रुपए किलो बिकता है, हजारों रुपये तनख्वाह पाने वाले अधिकारी औने-पौने दाम पर कर्मचारियों को भुगतान करते हैं।
कर्मचारी ने यह भी बताया कि कभी गाय बीमार हो, दूध न दे तो दोहरी मार झेलनी पड़ती है। अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि तुम्हारी जिम्मेदारी है, तुम दूध का इंतजाम करो। मजबूरी में र्कई बार बाजार से दूध खरीदकर देना पड़ता है।
फसल पर भी मांगते हैं हिस्सा
संस्थान में हर अधिकारी का बंगला करीब ढाई-तीन बीघा जमीन पर बना है। आउटडोर आवास के पास की कुछ जमीन पर कर्मचारी खेती करते हैं। कोई मौसमी सब्जियां उगाता है तो कोई थोड़े बहुत गेहूं-चावल।
लेकिन अधिकारी इस पर भी नजर रखते हैं। एक कर्मचारी ने बताया कि कड़ी मेहनत के बाद थोड़ा बहुत जो भी उगता है, उसमें भी साहब को हिस्सा देना पड़ता है।
आशियाने पर संकट
छह माह के भीतर परिसर में गुलदार के हमले की दूसरी घटना के बाद कर्मचारियों को आशियाने खत्म होने का डर सताने लगा है। कर्र्मचारियों के मुताबिक उन्हें मालूम हुआ है कि कुछ अधिकारियों ने आउटडोर क्वार्टर खाली करने का आदेश दिया है। हालांकि, ऐसा अधिकृत आदेश अब तक नहीं आया है।
बताया जा रहा है कि कुछ समय पूर्व आईसीएफआरई में संविदा पर रखे गए करीब 500 युवाओं को भी बिना नोटिस दिए निकाल दिया गया। ऐसे में कर्मचारियों को डर हैै कि उनसे भी घर छीन न लिया जाए।