लग्जरी कारों पर लोन के नाम पर करोड़ों रुपए डकराने वाले सफेदपोश बैंकों में बार-बार किरदार बदलते रहे हैं। कभी ऋण आवेदक तो कभी गारंटर बनकर बैंकों को चूना लगाते रहे।
शातिरों ने लोन पास कराने के लिए कभी पत्नी, बेटे तो कभी पुत्रवधु से लेकर दूसरे साथियों तक के नाम का सहारा लिया। सितंबर से लेकर फरवरी तक गिरोह ने कार लोन की झड़ी लगा दी। राष्ट्रीय कृत बैंकों में कार पर लोन की प्रतिर्स्पधा किसी से छिपी नहीं है।
हर बैंक अपनी लोन स्कीम से ग्राहकों को प्रभावित करना चाहता है। दूसरे ऋण के मुकाबले यह काफी आसान भी है, जो 10 से 15 दिन की अवधि में मिल जाता है। राजपुर रोड की नैनीताल बैंक शाखा से लिए गए लोन की लिस्ट पर नजर डाले तो साफ हो जाएगा कि सरकारी धन हड़पने की जालसाजों को कितनी जल्दी थी।
एक सवाल और पुलिस को खटक रहा है कि आखिरकार जालसाजों को नैनीताल बैंक की राजपुर शाखा ही क्यों रास आई। क्या यहां किसी से कोई सांठगांठ थी, यदि ऐसा नहीं था तो कभी ऋण आवेदक तो कभी गारंटरे बनकर आने वाले लोगों पर बैंक प्रबंधन ने शक क्यों नहीं जताया।
क्या था मामला
स्पेशल टास्क फोर्स ने बुधवार को बिना लग्जरी कार खरीदे ही बैंकों के करोडों रुपए डकारने वाले गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया था, जबकि 12 अन्य लोग फरार दर्शाएं थे।
गिरोह में शामिल लोगों में कई प्रापर्टी डीलर हैं तो अन्य व्यापार जगत से जुड़े है। राजनीतिक दलों में भी उनका अच्छा खासा दखल था। इन लोगों ने 16 बैंकों से करोड़ों रुपए का ऋण हजम कर लिया है।
नैनीताल बैंक में क्यों सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा हुआ है। सांठगांठ है या लापरवाही अभी कुछ कहना मुमकिन नहीं है। विवेचना के दौरान ही यह साफ हो पाएगा। व्यापक स्तर पर हुई जालसाजी को लेकर बैंक की कार्यशैली पर सवाल तो है।
- सदानंद दाते, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक