अब जाकर सिद्धू सहित सात अन्य के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा
इस मामले में अब शासन के आदेशों के बाद पुलिस की ओर से बीएस सिद्धू सहित सात अन्य आरोपियों के खिलाफ डीएफओ मसूरी वन प्रभाग की तहरीर पर 23 अक्तूबर को मुकदमा दर्ज किया गया है।
एफआईआर दर्ज कराना किसी भी न्यायालय की अवमानना नहीं
इस प्रकरण में पूर्व डीजीपी बीएस सिद्धू की ओर से मीडिया में बयान दिया गया कि उनके खिलाफ न्यायालय में वाद चल रहा है, इसलिए उन पर नई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती है। यह न्यायालय की अवमानना है। इस पर वन प्रमुख का कहना है कि एफआईआर दर्ज किए जाने से पूर्व वन विभाग की ओर से शासन को इस प्रकरण के सभी पहलुओं से अवगत कराया गया है। एफआईआर दर्ज होने से किसी भी न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन नहीं हुआ है।
वन विभाग के नाम दर्ज हो चुकी है भूमि
सिंघल ने बताया कि तत्कालीन डीएफओ मसूरी की ओर से जिलाधिकारी देहरादून के समक्ष सही तथ्य प्रस्तुत किए जाने के बाद राजस्व विभाग की ओर से बीएस सिद्धू के नाम हुआ दाखिल-खारिज निरस्त कर दिया गया था। इसके बाद भूमि को पुन: वन विभाग के नाम पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया।
...तो नत्थूराम को का किरदार पूर्व डीजीपी ने ही बुना था
इस मामले में बीएस सिद्धू की ओर से डीएम देहरादून को प्रेषित पत्र में बताया गया था कि उनके साथ नत्थूराम नामक व्यक्ति ने धोखाधड़ी की है। उन्होंने वन भूमि के क्रय के दौरान दी गई स्टांप ड्यूटी वापस करने के लिए भी अनुरोध किया था। लेकिन इस मामले में 10 साल बीत जाने के बाद भी नत्थूराम के खिलाफ कोई एफआईआर पूर्व डीजीपी की ओर से दर्ज नहीं कराई गई। जबकि सिद्धू के अनुसार उनसे इस मामले में 60 लाख रुपये लिए गए थे। वन प्रमुख ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि या तो सिद्धू ने ही फर्जी नत्थूराम को वन भूमि के विक्रेता के रूप में खड़ा किया था, या उनको नत्थूराम के फर्जी होने की पूरी जानकारी थी।
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स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराए जाने की संस्तुति की थी
वन प्रमुख सिंघल ने बताया कि अप्रैल 2016 में जिलाधिकारी देहरादून ने भी तत्कालीन मुख्य सचिव को संबोधित अपनी जांच आख्या में उल्लेख किया था कि सिद्धू के डीजीपी पद पर आसीन होने के कारण नियमित पुलिस से उनके ही उच्च पदस्थ अधिकारी के विरुद्ध सही जांच कराए जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। अत: इस प्रकरण की उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र आपराधिक जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से ही कराई जानी चाहिए।