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गायन में वाद्य यंत्रों की मोहताज नहीं थी कबूतरी देवी, कहलाती थीं कुमाऊं कोकिला

Sun, 08 Jul 2018 05:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागेश्वर
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kabootri devi
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उत्तराखंड की लोक कलाओं, रीति-रिवाजों को संजोने में लोक गायकों और लोक कलाकारों का बड़ा योगदान रहा है। इन्हीं में एक नाम कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी का भी है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कुमाऊं कोकिला की खासियत यह थी कि वह गायन में कभी भी वाद्य यंत्रों की मोहताज नहीं रहीं। उनके असमय चले जाने से हर कोई दुखी है। कबूतरी देवी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी हृदयस्पर्शी आवाज की खनक हर जगह मौजूद रहेगी।  सोर घाटी के लोक पारंपरिक गीतों की धुन बनाकर उन्मुक्त कंठ से गाना कबूतरी जी के जीवन की महानतम उपलब्धि रही। उनकी सुर लहरी में पिथौरागढ़ जिले समेत समूचे कुमाऊं क्षेत्र के पारंपरिक आख्यान निहित हैं। 

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राजकीय महाविद्यालय गरुड़ के असिस्टेंट प्रो. हेम चंद्र दुबे उत्तर कहते हैं कि कबूतरी देवी प्रमुख विधाओं में मंगल गीत, ऋतु रैण, पहाड़ के प्रवासी के दर्द, कृषि गीत, पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतीय सौंदर्य की अभिव्यक्ति, भगनौल न्यौली जागर, घनेली झोड़ा और चांचरी प्रमुख रूप से गातीं थीं। ऋतरैण में जो भागि जियलो गोरी नौ ऋतु सुणलो...यानि जो भाग्यवान जीएगा वह नौ ऋतुओं को सुनेगा, फूल देई छम्मा देई भर भकार दैणी द्वार...यानि फूल तुम्हारी दहलीज पर बिखर गए हैं तुम्हारे घर में धन-धान्य भरा रहे समेत कई अन्य गीत गातीं थीं। उनके गायन शैली में एक मार्मिक स्तर था। जब वो गाती थीं तो लोग अवाक रह जाते थे। लोक गायक आनंद कोरंगा ने पहाड़ को ठंडो पाणी...और आज पनी झाऊं -झाऊं... गाकर कबूतरी देवी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।          

मंच न मिलने के बावजूद उत्तरायणी मेले में आती रहीं     
उत्तरायणी मेला समिति ने कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी को कभी भी मंच पर आमंत्रित नहीं किया, लेकिन मेले को लेकर वह खासी उत्साहित रहतीं थीं। मंच न मिलने के बावजूद वह वर्ष 1980 और 90 के दशक में चौक बाजार में बैर, भगनौल गाने वालों के साथ अलग-अलग ऋतुओं में गाए जाने वाले ऋतु रैण और अन्य गीतों के जरिये महफिल जमा देतीं थीं। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन कांडपाल बताते हैं कि लोग उनके गायन की शुरुआत होते ही वहां जमा हो जाते थे। पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद वह विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं। 

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आर्थिक परेशानियां जीवन पर्यंत रही हावी  

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 कबूतरी देवी का जीवन संघर्षों में गुजरा। पति दीवानी राम की मौत के बाद तो वह आर्थिक रूप से टूट गईं और उन्होंने गांव से निकलना कम कर दिया। वर्ष 2000 में नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के हेमराज बिष्ट कबूतरी देवी के घर गए और उन्हें फिर से गाने के लिए प्रोत्साहित किया। आर्थिक दिक्कतों के चलते कबूतरी देवी ने तब गाना छोड़ दिया था।  उनकी बेटी हेमंती निवासी सेरीकुम्डार ही उनकी देखभाल करती थीं। गांव में कामकाज के चलते वह क्वीतड़ कम जा पाती थीं। पिछले दो-तीन वर्षों से हेमंती की बेटी रिंकू कक्षा आठ की पढ़ाई छोड़ नानी की देखभाल में जुटी थी। कबूतरी देवी को वर्ष 2006 से राज्य सरकार की ओर से पेंशन मिलती थी। इसी से उनका खर्चा चलता था। बेटा भूपेंद्र चार-पांच साल में एक बार वड्डा आकर मां के हालचाल लेता था। इसके बाद देवीधुरा, द्वाराहाट, लखनऊ, कुमाऊं महोत्सव नैनीताल, पिथौरागढ़ छलिया महोत्सव में गाए गीतों से उन्हें नई पहचान मिली। 

अभावों के कारण बचा नहीं पाए
नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के अध्यक्ष हेमराज बिष्ट ने कहा कि दुर्भाग्य है कि लोक गायिका कबूतरी दीदी आज हमारे बीच नहीं हैं। अभावों के चलते हम उन्हें नहीं बचा पाए। जिला अस्पताल से रेफर करने के बाद शुक्रवार दोपहर दो बजे से ही हेलीकॉप्टर का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने कहा कि समय पर इलाज मिल जाता तो कबूतरी दीदी बच सकती थीं। लोक संस्कृति के जानकार और वरिष्ठ रंगकर्मी जनार्दन उप्रेती का कहना है कि कबूतरी दीदी की गायन शैली अलग थी। हमने लोक धरोहर खो दिया है। उन्हें हर संभव बचाने के प्रयास हो रहे थे। शनिवार सुबह साढ़े छह बजे उन्हें लेकर नैनीसैनी हवाई पट्टी पर पहुंचे। करीब डेढ़ घंटे इंतजार करने के बाद हेलीकॉप्टर नहीं आने से उन्हें फिर से अस्पताल लाए। उन्हें बताया गया कि आठ बजे हेलीकॉप्टर पहुंचेगा।

लोकगीतों को लयबद्ध नहीं कर पाने का अफसोस
चांदनी इंटरप्राइजेज डीडीहाट के इंजीनियर नवीन टोलिया कबूतरी देवी के लोक गायन की पौराणिक शैली को जिंदा रखने के लिए उनकी आवाज में कैसेट निकालना चाहते थे। पहाड़ पर चैत माह के दौरान गांव-गांव घूमकर गाए जाने वाले गीतों की विधा में कबूतरी देवी पारंगत थीं। उनकी आवाज को धरोहर के रूप में लयबद्ध कर भावी पीढ़ी के समक्ष लाने की इच्छा अधूरी ही रह गई। कबूतरी देवी की बेटी हेमंती ने बताया कि छह जुलाई 2017 को सेरी कुम्डार में उनके रहने के लिए 12 मुट्ठी जमीन देने की मांग सरकार के समक्ष उठाई गई। राजस्व विभाग ने जमीन के कागजात भी तैयार कर दिए। बावजूद इसके प्रशासन की ओर से उन्हें जमीन नहीं मिल पाई। उन्होंने कहा कि वह मां की देखभाल के लिए लगातार क्वीतड़ गांव नहीं जा सकती थी। इसके चलते जमीन की मांग की गई थी। उन्होंने कहा कि यदि जमीन मिल जाती है तो उसमें लोकगायिका की सांस्कृतिक धरोहरों की स्मृति सहेजी जाएगी।

पहाड़ की आवाज कबूतरी देवी के गीतों ने मचाई थी धूम

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70-80 के दशक में पहाड़ की आवाज हुआ करतीं थीं उत्तराखंड की पहली लोक गायिका कबूतरी देवी। लोग उनकी आवाज के दीवाने हुआ करते थे। कबूतरी को पिता से मिली संगीत की प्रारंभिक शिक्षा और पति के संबल ने ही मुकाम तक पहुंचाया। कबूतरी देवी के चले जाने के बाद उनकी खनकती आवाज सुनने के लिए लोगों के कान तरसेंगे।

पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने वाली कबूतरी की काबिलियत को उनके पति ने बखूबी परखा और आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिए प्रेरित किया। यह वह दौर था, जब पहाड़ की महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिए नहीं गातीं थीं। पति की प्रेरणा से कबूतरी आकाशवाणी से गीतों की प्रस्तुति देने को राजी हुईं। 70 के दशक में इन्होंने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी।

आज पनि झाऊं - झाऊं, भोल पनि झाऊं - झाऊं,  पोरखिन त न्है जूंला, स्टेशन सममा पूजै दे मलाई, पछिल बीराना ह्वै जूंला गीत लोगों की जुबां पर छा गया। कबूतरी के गीत पहाड़ों को ठंडो पाणि कि भलि मीठी बाणी, दूर आसमान का तारा, जुन्याली रात आदि गीत लोगों के दिलों पर राज कर गए। कबूतरी पंचम सुर में गाती थीं। उनके गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद, चर्चगेट मुंबई के केंद्रों से प्रसारित हुए। उन्होंने करीब 100 गाने आकाशवाणी से गाए। कबूतरी देवी अपने पति दीवानी राम को नेताजी कहकर पुकारतीं थीं। वर्ष 1984 में उनके पति का निधन हो गया, इसके बाद कबूतरी ने आकाशवाणी से गाना बंद कर दिया।

आखिरी सांस तक साथ रहीं हेमंती
कबूतरी देवी का अंतिम समय छोटी बेटी हेमंती के साथ बीता। वह करीब 15 साल से हेमंती के गांव सेरी कुम्डार में रहती थीं। अंतिम समय में भी हेमंती ही साथ रहीं। बड़ी बेटी मंजू अपने परिवार के साथ खटीमा में रहती हैं। बेटा भूपेंद्र अपने बच्चों के साथ मुंबई में रहता है।
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लोक गायिका को हेलीकॉप्टर से नहीं भेजे जाने से नाराज रंगकर्मियों ने किया प्रदर्शन

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लोक गायिका कबूतरी देवी को हायर सेंटर ले जाने के लिए समय पर हेलीकॉप्टर नहीं भेजने से रंगकर्मियों में आक्रोश है। उन्होंने कबूतरी देवी के शव के साथ जिला अस्पताल में प्रदर्शन कर नाराजगी जताई। कबूतरी देवी के निधन की खबर सुनते ही सभी रंगकर्मी जिला अस्पताल पहुंचे। आईसीयू से कबूतरी देवी का शव निकालने के बाद रंगकर्मियों ने जिला अस्पताल के बाहर शासन एवं उड्डयन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि स्वीकृति के बावजूद समय पर हेलीकॉप्टर पिथौरागढ़ हवाई पट्टी पर नहीं लाया गया। समय पर हायर सेंटर नहीं पहुंचने के कारण कबूतरी देवी का निधन हुआ है। प्रदर्शन करने वालों में रंगकर्मी हेमराज बिष्ट, जनार्दन उप्रेती जन्नूदा, राजेंद्र भट्ट, क्वीतड़ के प्रधान श्याम सुंदर सिंह सौन आदि थे।

कांग्रेस ने प्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराया
लोक गायिका कबूतरी देवी के निधन पर कांग्रेस जिलाध्यक्ष मुकेश पंत ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि कबूतरी देवी की मौत के लिए प्रदेश सरकार जिम्मेदार है। यदि दो दिन से अस्पताल में भर्ती लोक गायिका को समय पर हेली सेवा मिल जाती तो उनका जीवन बचाया जा सकता था। ऋषेंद्र महर ने कहा कि लोक गायिका के लिए दो दिन तक हेलीकॉप्टर की व्यवस्था नहीं की गई। यह बेहद निंदनीय है।

मुख्यमंत्री सहित कई नेताओं ने जताया शोक
लोक गायिका कबूतरी देवी के निधन पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, वित्त मंत्री प्रकाश पंत, केंद्रीय कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा सहित कई नेताओं ने गहरा दुख व्यक्त किया है। पूर्व पालिकाध्यक्ष जगत सिंह खाती, एनएसयूआई के महासचिव दीपक तिवारी आदि ने भी कबूतरी देवी के निधन पर दुख जताया है।
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