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दुनिया में हर्बल का बोलबाला, यहां नहीं कोई पूछने वाला

Sat, 01 Nov 2014 04:35 PM IST
प्रमोद सेमवाल/अमर उजाला, गोपेश्वर
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कुदरत ने हिमालयी राज्य उत्तराखंड को बेशकीमती जड़ी-बूटियों के खजाने से नवाजा है। पूरी दुनिया में हर्बल उत्पादों की धूम है। आर्थिक संसाधनों के लिए कौड़ी-कौड़ी को तरसता यह राज्य हर्बल उत्पादों से मालामाल हो सकता था, सैकड़ों को रोजगार मिल सकता था। मगर ऐसा न हो सका।
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राज्य को उत्तर प्रदेश से चमोली जिले की मंडल घाटी में जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान के रूप में एक अहम इदारा विरसे में मिला था।

राज्य स्थापना के 14 साल बाद हाल यह है कि यह संस्थान सिर्फ तीन संविदा वैज्ञानिकों के भरोसे चलाया जा रहा है, जबकि जड़ी-बूटियों के शोध एवं संरक्षण के लिए यहां 17 वैज्ञानिकों की तत्काल तैनाती जरूरी है। पांच करोड़ की मशीनें धूल फांक रही हैं। इसी से उत्तराखंड की अब तक की सभी सरकारों की प्रदेश की इस इकलौते संस्थान के प्रति प्रतिबद्धता का पता लगता है।

वर्ष 1989 में यूपी सरकार ने मंडल घाटी में जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान की स्थापना की थी। मकसद था, जड़ी-बूटियों की खेती और दुर्लभ हिमालयी बूटियों के सम्यक दोहन का। उस वक्त संस्थान के सहयोग से मंडल, खल्ला, देवाल, घाट, नारायणबगड़, गैरसैंण और जोशीमठ के काश्तकारों ने लेमनग्रास, चिरायता, कुटकी, धतूरा, ब्रह्मी, पाषाणभेद, पत्थर चूर, रीठा, तिलपुष्पी आदि जड़ी-बूटियों की खेती भी की गई।
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संस्थान काश्तकारों को कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य क्षेत्रों में भ्रमण के लिए ले जाता था। जिससे वे बाहर के कुशल काश्तकारों से जड़ी-बूटियों की खेती के बारे में जानकारी हासिल करते थे। संस्थान के जरिये मैदानी क्षेत्रों की डाबर जैसी प्रतिष्ठित दवा कंपनियां काश्तकारों से जड़ी-बूटी खरीदती थीं। लेकिन अब यह सब ठप है।
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क्या कहते हैं काश्तकार?

पूर्व में संस्थान में वैज्ञानिकों ने हमें परंपरागत खेती के साथ ही जड़ी-बूटी के कृषिकरण के लिए प्रेरित किया। लेकिन आज जड़ी-बूटी संस्थान में वैज्ञानिकों की कमी काश्तकारों पर भारी पड़ रही है। जड़ी-बूटियों की खरीददारी के लिए भी कोई नहीं आ रहा है।
-गोविंद सिंह बिष्ट, मंडल क्षेत्र निवासी

संस्थान में वैज्ञानिकों की तैनाती के लिए शासन से लगातार पत्राचार किया जा रहा है। विलुप्त हो रही जड़ी-बूटियों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। हमें और वैज्ञानिकों की दरकार है। शीघ्र ही पुन: इस संबंध में शासन से पत्राचार किया जाएगा।
-हयात राम, निदेशक, जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान, मंडल, (चमोली)।

जड़ी बूटी शोध संस्थान पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया, यह बात सच है। संस्थान का ढांचा करीब-करीब तैयार कर लिया गया है। यह इस बार की कैबिनेट में भी रखा जाएगा। हाल ही में मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में भी मैंने यह बात उठाई थी और कहा था कि राज्य की इस धरोहर का पुनर्जीवित तभी किया जा सकता है जब इसका पुनर्गठन हो।
-हरक सिंह, कृषि, उद्यान मंत्री
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