कुदरत ने हिमालयी राज्य उत्तराखंड को बेशकीमती जड़ी-बूटियों के खजाने से नवाजा है। पूरी दुनिया में हर्बल उत्पादों की धूम है। आर्थिक संसाधनों के लिए कौड़ी-कौड़ी को तरसता यह राज्य हर्बल उत्पादों से मालामाल हो सकता था, सैकड़ों को रोजगार मिल सकता था। मगर ऐसा न हो सका।
राज्य को उत्तर प्रदेश से चमोली जिले की मंडल घाटी में जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान के रूप में एक अहम इदारा विरसे में मिला था।
राज्य स्थापना के 14 साल बाद हाल यह है कि यह संस्थान सिर्फ तीन संविदा वैज्ञानिकों के भरोसे चलाया जा रहा है, जबकि जड़ी-बूटियों के शोध एवं संरक्षण के लिए यहां 17 वैज्ञानिकों की तत्काल तैनाती जरूरी है। पांच करोड़ की मशीनें धूल फांक रही हैं। इसी से उत्तराखंड की अब तक की सभी सरकारों की प्रदेश की इस इकलौते संस्थान के प्रति प्रतिबद्धता का पता लगता है।
वर्ष 1989 में यूपी सरकार ने मंडल घाटी में जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान की स्थापना की थी। मकसद था, जड़ी-बूटियों की खेती और दुर्लभ हिमालयी बूटियों के सम्यक दोहन का। उस वक्त संस्थान के सहयोग से मंडल, खल्ला, देवाल, घाट, नारायणबगड़, गैरसैंण और जोशीमठ के काश्तकारों ने लेमनग्रास, चिरायता, कुटकी, धतूरा, ब्रह्मी, पाषाणभेद, पत्थर चूर, रीठा, तिलपुष्पी आदि जड़ी-बूटियों की खेती भी की गई।
संस्थान काश्तकारों को कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य क्षेत्रों में भ्रमण के लिए ले जाता था। जिससे वे बाहर के कुशल काश्तकारों से जड़ी-बूटियों की खेती के बारे में जानकारी हासिल करते थे। संस्थान के जरिये मैदानी क्षेत्रों की डाबर जैसी प्रतिष्ठित दवा कंपनियां काश्तकारों से जड़ी-बूटी खरीदती थीं। लेकिन अब यह सब ठप है।