पानी जहां तक छू गया वो जमीन नदी की है। अगर कभी इस पर किसी ने कब्जा किया तो नदी अपनी जमीन लेना जानती है। इससे कोई डूब क्षेत्र में कब्जा न करे।
जल विज्ञानियों ने यह सुझाव उत्तराखंड सरकार को दिया है। इसके साथ ही केंद्रीय जल आयोग की टीम ने आने वाले दिनों में बाढ़ की स्थिति और भयावह होने की आशंका व्यक्त की है। इससे आयोग नदी किनारे अपनी साइटों की संख्या और बढ़ा रहा है।
बाढ़ की अधिकतम सीमा निश्चित होती है
केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के वरिष्ठ जल विज्ञानी डा. केपी त्रिपाठी का कहना है कि किसी भी नदी में बाढ़ की अधिकतम सीमा निश्चित होती है। पचास से सौ साल के अंतराल में नदी अपने पूर्ण रूप में अवश्य आती है। उन्होंने सलाह दी है कि नदी के डूब क्षेत्र को फौरन खाली कर देना चाहिए। नदी का पानी एक बार जहां तक जमीन पर फैल गया, उस हद तक बाढ़ का पानी कभी भी पहुंच सकता है।
वरिष्ठ जल विज्ञानी डा. अम्बरीश कुमार का कहना है कि पहाड़ किनारे नदी के डूब का हिस्सा चारागाह होता है। आवासीय कालोनी बनाने के लिए नहीं। इंसान के रहने के लिए पहाड़ का मध्य और ऊपर वाला हिस्सा होता है। डा त्रिपाठी ने बताया कि दुनिया की बड़ी आबादी पहाड़ों पर रहती है। लेकिन इसकी प्लानिंग होनी चाहिए।
विज्ञानियों ने इस संबंध में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और मुख्य सचिव सुभाष कुमार से भी बात की है। उन्होंने बताया कि इस बाबत सरकार को इसी महीने लिखित सुझाव भी भेजे जाएंगे।
ग्राफ और आंकड़े जुटाए
इधर, केंद्र सरकार की टीम ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति का जायजा लिया। बाढ़ की स्थिति और नदियों में पानी बढ़ने संबंधी ग्राफ और आंकड़े जुटाए। टीम ने आइंदा बाढ़ के और भयावह रूप धारण करने का अंदेशा भी जाहिर किया है।
केंद्र सरकार की टीम के सदस्य रहे केंद्रीय जल आयोग के अधीक्षण अभियंता हरिकेश कुमार ने बताया कि आयोग नदी किनारे अपनी साइटों की संख्या में इजाफा करेगा। इसके साथ ही साइटों पर और उच्चीकृत संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। अभी नदी किनारे आयोग की 11 साइटें चल रही हैं। आपदा में आधी साइटों के संयंत्र बह गए हैं।
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