वित्त महकमे की जड़ता सीएम के विशेषाधिकार पर भारी पड़ रही है। बीते दिनों मुख्यमंत्री हरीश रावत ने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए डॉक्टरों की तबादला नीति को मंजूरी दी थी।
उनका मकसद था कि पहाड़ों पर डॉक्टरों की किल्लत को देखते हुए जल्द वहां तैनाती और तबादले किए जा सकें। लेकिन वित्त विभाग सीएम के विशेषाधिकार पर कुंडली मारकर बैठ गया।
विभागीय मंत्री से जताई थी नाराजगी
सीएम की मंजूरी वाली फाइल तीन हफ्ते से वित्त विभाग में लटकी हुई है। इस बीच शासन 43 चिकित्सकों का तबादला कर चुका, और 88 चिकित्सकों के तबादले की तैयारी है।
सीएम अतिमहत्वपूर्ण प्रस्तावों को ही विशेषाधिकार से पारित करते हैं, जिससे उसका अनुपालन तुरंत हो सके। गौरतलब है कि तबादला नीति तैयार करने में हुई देरी पर सीएम ने विभागीय मंत्री और अधिकारियों से नाराजगी जताई थी।
वित्त ने लटका दी तबादला नीति
स्वास्थ्य महकमे में चिकित्सकों के तबादलों में होने वाली देरी और गड़बड़ियों को दूर करने के लिए 28 अगस्त को सीएम ने तबादला नीति को मंजूरी दी थी।
विशेषाधिकार से पारित कर सीएम ने यह संदेश दिया था कि चिकित्सकों को पर्वतीय क्षेत्रों में तैनात करना उनकी प्राथमिकता है। सीएम ने विभाग की कैबिनेट में स्थानांतरण नीति लाने की दलील को दरकिनार कर विशेषाधिकार से मंजूरी तो दी, लेकिन वित्त ने लटका दिया।
नीति में तबादलों पर चिकित्सकों को मिलने वाले वित्तीय लाभ के प्रावधानों पर वित्त की मंजूरी के बाद प्रमुख सचिव स्वास्थ्य जारी कर सकते हैं। इस बीच विभाग में 6 सितंबर को 43 अपर निदेशक, संयुक्त निदेशक और सीनियर मेडिकल अफसरों का तबादला किया गया।
इसमें पांच जनपदों के सीएमओ के तबादले भी शामिल हैं। कुछ चिकित्सकों ने सवाल खड़े करते हुए इसे हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है।
88 चिकित्सकों का होना है तबादला
बीते सप्ताह सीनियर मेडिकल अफसर पद के 88 चिकित्सकों को ज्वाइंट डायरेक्टर बना दिया गया, लेकिन उनके तबादले अभी नहीं किए गए हैं। इनके तबादलों की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
नए शासनादेश के अभाव में इन चिकित्सकों का तबादला भी पुराने ढर्रे पर होगा। ऐसे में सीएम के चिकित्सकों को पहाड़ में पहुंचाने के लिए विशेषाधिकार इस्तेमाल कारगर होता नहीं दिख रहा है।