हिमालय बचाओ अभियान के तहत आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे विशेषज्ञों ने हिमालय बचाओ पर चर्चा की।
विशेषज्ञों ने उत्तराखंड में आई आपदा के लिए नदी किनारे हुए बेतहाशा निर्माण कार्यों के साथ परियोजनाओं को भी दोषी बताया।
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संपदा का आधार बनकर रह गया प्रदेश
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के हैप्रेक सभागार में आयोजित सम्मेलन में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति देश का आधार रही है, लेकिन आज यह प्रदेश संपदा का आधार बनकर रह गया है।
शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण रूपी तीन विकारों ने इस प्रदेश की सभ्यता को लील लिया है। इसलिए इन विकारों को दूर करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
नदियों को पुनर्जीवित करने की नीतियां
हिमालय और उसकी नदियों को पुनर्जीवित करने की नीतियां कार्यान्वित करने की जरूरत है। गढ़वाल विवि के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जेपी पचौरी ने कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए, जिसका उपभोग कई पीढ़ियां करें।
महाराष्ट्र से पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता विवेकानंद ने कहा कि देशी और विदेशी बाजारों में यहां की वनौषधियां बेची जाती हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता।
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भागीदारी और लाभ तय
प्राकृतिक संपदा पर स्थानीय लोगों की भागीदारी और लाभ तय किया जाना चाहिए। कमल जोशी ने कहा कि उत्तराखंड में तकनीकी की कोई कमी नहीं है।
इस मौके पर महिपाल सिंह नेगी, कार्यक्रम संयोजक अरण्य रंजन, समीर रतूड़ी, राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, महिला मंच नेत्री कमला पंत, सुशीला भंडारी, साहब सिंह सजवाण आदि ने विचार रखे।
नदी किनारे न हों निर्माण : प्रो.वाल्दिया
सम्मेलन के दूसरे सत्र में वरिष्ठ भूगर्भवेत्ता प्रो. खड्ग सिंह वाल्दिया ने कहा कि बादल फटने जैसी कोई घटना नहीं होती। लंबे समय तक बारिश न होने के बाद 16-17 जून को अचानक अल्पकालिक अतिवृष्टि से ही आपदा आई थी। हर 100 वर्ष में बाढ़ आती है, इसलिए नदी किनारे निर्माण कार्य नहीं करने चाहिए।
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इस मौके पर पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक, प्रो. डीआर पुरोहित, डा. मोहन पंवार, इंद्रेश मैखुरी, डा. अरविंद दरमोड़ा, डा. सुरेंद्र भट्ट और त्रेपन सिंह चौहान समेत कई विशेषज्ञों ने विचार रखे।
यात्रा के लिए समय सीमा न हो तय
हिमालय बचाओ आंदोलन की ओर से आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में गढ़वाल विश्वविद्यालय के छात्रों ने कुछ सुझाव भी दिए। गढ़वाल विश्वविद्यालय में अध्ययनरत समाजकार्य की छात्रा हिमानी कंडारी ने कहा कि आपदा के बाद राज्य के नवनिर्माण में प्रभावितों की भूमिका भी तय की जाती तो ज्यादा बेहतर होता।
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पर्यटन की अपार संभावनाएं
समाजकार्य अंतिम वर्ष के छात्र मुस्तफा ने कहा कि उत्तराखंड में यात्रा के लिए समय सीमा तय नहीं होनी चाहिए। यहां साल भर प्रत्येक माह नियोजित ढंग से पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं।
छात्र दिनेश सिंह ने स्थानीय विकास में जब तक ग्रामीणों की भूमिका तय नहीं की जाती, गांव के विकास का संकल्प पूरा नहीं हो सकता। रिजवान अली, प्रज्ञा, संगीता बडोनी, निशा राणा, प्रिया रस्तोगी, प्रियांशू खत्री सहित कई अन्य छात्रों ने भी विषय विशेषज्ञों के समक्ष सवाल किए।