बता दें कि वायुमंडलीय विक्षोभ विमान दुर्घटनाओं और वायुयान की उड़ान में बाधा का एक प्रमुख कारण है। इस शोध में चौंकाने वाला निष्कर्ष मिला कि उत्तर भारत में टर्बुलेंस के विभिन्न मापदंडों एडी डिफ्यूजन और काइनेटिक एनर्जी डीसीपेशन रेट का मान पूर्व अनुमान से दस गुना तक अधिक है।
एरीज के वैज्ञानिक डॉ. मनीष नजा के अनुसार इतने जबरदस्त टर्बुलेंस का कारण पर्वतीय भूभाग द्वारा वायु में उत्पन्न होने वाली उर्ध्व (वर्टिकल) धाराएं हैं, जो वायुमंडल में बहुत अधिक ऊंचाई तक भंवर उत्पन्न कर सकती हैं। एसटी रडार की इस उपयोगिता का वायुमंडल में प्रबल विक्षोभ वाले संवेदनशील क्षेत्रों का पता लगाया जा सकेगा और उसका पूर्वानुमान भी किया जा सकेगा, जिससे हवाई यात्रा में संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सकेगा।
दो वर्ष शोध के बाद अध्ययन पूरा किया
एरीज के वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार नजा और उनके शोध छात्र आदित्य जायसवाल ने एरीज के इंजीनियर समरेश भट्टाचार्य और वैज्ञानिक डॉ. डीवी फनीकुमार के सहयोग से दो वर्ष शोध के बाद यह अध्ययन पूरा किया। एरीज के निदेशक प्रो. दीपांकर बनर्जी ने बताया कि यह रडार डॉप्लर प्रभाव का प्रयोग करके लगभग 20 किलोमीटर ऊंचाई तक हवा की गति और दिशा की गणना करने में सक्षम है।
इसकी खासियत यह है कि परंपरागत 50 मेगाहर्ट्ज रडार से भिन्न यह सारा रडार सिस्टम एक ही भवन में समाहित है। भवन की छत पर 588 एंटीना लगभग वृत्ताकार आकृति में हैं और उसकी निचली मंजिल पर उतने ही ट्रांसमीटर रिसीवर हैं। इसमें एंटीना को बिना घुमाए मात्र इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल से ही रेडियो बीम को किसी भी दिशा में भेजा जा सकता है।