लोक गायक अमित सागर ने कहा कि वही बोली-भाषाएं समृद्ध होंगी जो आर्थिकी से जुड़ी होंगी और लोगों का पेट भरने में सक्षम होंगी। प्रदेश के सभी लोक कलाकार उत्तराखंड की आंचलिक भाषाओं में काम कर रहे हैं, क्योंकि इससे उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। जिन लोगों को हिंदी से रोजगार मिलता है, वो हिंदी को बढ़ावा देते हैं। अंग्रेजी ने देश में रोजगार के तमाम नए अवसर दिए हैं। वैसे भी अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा न होकर लाइफस्टाइल और स्टेटस सिंबल बन चुकी है। इसी तरह के प्रयास हिंदी और लोक भाषाओं के साथ भी करने होंगे। हिंदी का बाजार बेहद विस्तृत है। हिंदी देश के लाखों लोगों को जोड़ने का काम करती है।
दिमाग के साथ दिलों को जोड़ती है हिंदी : भरतवाण
जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने कहा कि अंग्रेजी दुनियाभर के दिमाग को जोड़ती है, लेकिन हिंदी दिल जोड़ने का काम करती है। विदेशों में बसे लोग भी अपनों से मिलकर अपनी भाषा में बात करना पसंद करते हैं। ये हिंदी की ताकत है, जिसे गूगल और फेसबुक जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियां पहचान रही हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदी के साथ अपनी दुधबोली (मातृ भाषा) को भी समृद्ध किया जाए। क्षेत्रीय भाषाएं ही हिंदी की जननी रही हैं। पूरे भारत में 16 सौ से ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं, जिनके हजारों-लाखों शब्द हिंदी को समृद्ध कर रहे हैं। 17वीं सदी के बाद स्थानीय भाषाओं से हिंदी का प्रादुर्भाव हुआ। हिंदी बड़े क्षेत्र की भाषा बन चुकी है। उन्होंने कहा कि लोक भाषाओं में आत्मीयता होती है। अंग्रेजी जरूरत के चलते सीखी जा रही है। गढ़वाली भाषा का साहित्य भी बेहद समृद्ध है। कई जगह गढ़वाली में हिंदी से ज्यादा शब्द हैं। उसके बावजूद लोक भाषाओं का विकास एक बिंदु पर आकर रुक गया है। भाषा का उन्नयन बेहद जरूरी है। संविधान की आठवीं अनुसूची में गढ़वाली, कुमाऊंनी को शामिल करने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि इन भाषाओं को अनुसूची में शामिल किया जाए। स्कूल में हिंदी-अंग्रेजी के साथ लोक भाषाएं भी पढ़ाई जाएं
प्रयोगधर्मिता और नवाचार से बढ़ेगी लोक भाषाएं : महिपाल
प्रसिद्ध लोक गायक किशन महिपाल का मानना है कि प्रयोगधर्मिता और नवाचार से ही लोक भाषाएं आगे बढ़ेंगी। कलाकारों को प्रयोग करने की छूट मिलनी चाहिए, तभी भाषा, साहित्य, संगीत, कला में नई चीजें सामने आएंगी। परंपरागत रूप में एक लाइन पर चलने से भाषा समृद्ध नहीं होगी। किशन महिपाल ने कहा कि लोक भाषा, कला, संस्कृति में सभी परंपराओं का पुट जरूरी है। बहुत बार ऐसा होता है जब किसी नए गीत को लोग सिर्फ यह कहते हुए अस्वीकार कर देते हैं कि यह संस्कृति या भाषा से छेड़छाड़ है। अगर सिर्फ परंपरागत पुराने गीत, संगीत या कला को परोसा जाए तो लोग कहते हैं कि ये तो पुराना है, इसमें नया क्या है। पारंपरिक लोक कलाओं और गीत-संगीत में शोध करने की जरूरत है। इससे हिंदी को भी फायदा होगा क्योंकि हिंदी के शब्द भंडार भी इन्हीं भाषाओं के शब्दों से भरे हुए हैं।
भाषाओं के उत्थान को करने होंगे ठोस प्रयास : रजनीकांत
स्थानीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार का जिम्मा साहित्यकारों और कलाकारों पर है। भाषाओं के उत्थान के लिए सरकारों को भी ठोस प्रयास करने होंगे। लोक गायक रजनीकांत सेमवाल ने कहा कि सरकारों ने बोली-भाषा के प्रचार-प्रसार और संरक्षण-संवर्धन के लिए अकादमी तो खोली है लेकिन इसका कितना फायदा अब तक भाषाओं को मिला, इसको लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता। जरूरत ठोस योजनाएं बनाकर उनको धरातल पर उतारने की है। उन्होंने कहा कि सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
उत्तराखंड की म्यूजिक व फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े ज्यादातर कलाकार अपनी बोली भाषा को बढ़ावा देने में जुटे हैं। देश दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में संस्कृति और बोली-भाषा को पहुंचाने में इन कलाकारों की अहम भूमिका है। जैसे-जैसे हिंदी का बाजार बढ़ रहा है इस पर शोध के कार्यों में गति आई है। इसी तरह की जरूरत लोक भाषाओं को भी है। राज्य सरकार को लोक भाषाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में भी प्रयास करने चाहिए। देश के कई ऐसे राज्य हैं, जहां पर लोक भाषाओं की पढ़ाई बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोक भाषा जानने-सीखने से किसी भी व्यक्ति का उस राज्य के प्रति भावनात्मक लगाव होता है।