फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वन रैंक वन पेंशन पर केंद्र ने बिगाड़ा पूर्व सैनिकों का गणित

Sun, 06 Sep 2015 12:36 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
केंद्र का वन रैंक वन पेंशन का दिया तोहफा पूर्वसैनिकों कबूल तो है, लेकिन असल मांग पर थोपी कुछ शर्तें उनकी खुशी को किरकिरा कर रही हैं।
विज्ञापन


केंद्र ने ओआरओपी का जो फार्मूला निकाला है वह पूर्व सैनिकों के गणित को बिगाड़ रहा है। वर्ष 2006 से पूर्व रिटायर हुए सैनिकों को मौजूदा पेंशन धारकों के सामान धनराशि ही उनकी मुख्य मांग थी जिसे नहीं माना गया। हर दस वर्ष में पेंशन बराबरी केलिए केंद्र 1996 से रिव्यू कर रहा है, जिसे अब पांच वर्ष कर दिया है।

केवल ओआरओपी की घोषणा से केंद्र जिस वाहवाही की उम्मीद पूर्वसैनिकों से चाहती थी वह उसे नहीं मिलेगी। पूर्व सैनिकों की ओआरओपी की मांगों का जो पिटारा है वह अब भी खाली नहीं हुआ। उनके अनुसार सरकार कुछ भी अपनी घोषणा में नहीं दे पाई।
विज्ञापन


आनरेरी कैप्टन ओपी रावत (रि) ने कहना है कि केंद्र से हमें इस तरह की घोषणा की उम्मीद नहीं थी। केंद्र उनकी एक अप्रैल 2014 से लागू करने की मांग तक नहीं माना इससे ज्यादा उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। कर्नल बीएम थापा (रि) ने कहा कि हर पांच वर्ष में पेंशन रिव्यू की जो शर्त लगाई है वह बिल्कुल गलत है।

इतना ही नहीं रिव्यू के लिए कमेटी गठित कर दी उसमें पूर्व सैनिक या सेवारत सैनिक अधिकारी नहीं रखे। उन्होंने कहा कि पूर्व सैनिकों को घोषणा पर दोबारा चिंतन करना होगा। पूर्व सैनिक संगठनों के संयुक्त फ्रंट ने कहना है कि मूवमेंट पर जो केंद्रीय संगठन फैसला लेंगे उसी तरह से प्रदेश में रणनीति बनेगी।

औसत पेंशन जैसा कोई गणित नहीं होता
लेफ्टिनेंट जनरल ओपी कौशिक (रि) ने कहा कि केंद्र ने सिर्फ ओआरओपी पर पूर्वसैनिकों को ठगने की कोशिश की है। हमारी जो प्राथमिक मांगें थी उनपर सरकार ने अड़ंगे लगा कर उसे और पेचीदा बना दिया।

एक रैंक पर अभी जारी हो रही अधिकतम और न्यूनतम पेंशन का औसत निकाल कर उसे देने की बात पूरी तरह से गलत है। हम नए पुराने सैनिकों के रैंक में पेंशन अंतर को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी।

वीआरएस की शर्त ने किया अनर्थ
एक्ससर्विसेज लीग के संरक्षक ब्रिग्रेडियर केजी बहल (रि) का कहना है कि सिर्फ इतना है कि केंद्र ओआरओपी को लागू करने को तैयार हो गया, लेकिन उसमें जो शर्तें थोपी दी वह अस्वीकार योग्य नहीं हैं।

जिस वीआरएस की बात रक्षा मंत्रालय कर रहा है वैसा सेना में नहीं होता। हमारे जवान 15 वर्ष केबाद और अफसर 20 वर्ष में पेंशन केहकदार हैं और उनकी पेंशन सर्विस वर्षों के अनुरूप मिलती है। ऐसे में वीआरएस का जो फार्मूला है उससे 45 प्रतिशत पूर्वसैनिकों से अन्याय होगा।

अफसर जवान में पेंशन अंतर घटेगा
सेना के अन्य रैंक से रिटायर सैनिकों के संगठन पीबीओआर पूर्वसैनिक संगठन केअध्यक्ष पैराट्रूपर शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि वन रैंक वन पेंशन लागू करने में सरकार ने कई खामियां छोड़ दी, लेकिन इससे अफसर और जवान के पेंशन अंतर में कमी आने की संभावना है।

यही नहीं पूर्वसैनिक विधवाओं को एक साथ एरियर देने की घोषणा भी स्वागत योग्य है। जो मांगें पूरी नहीं र्हुई उसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।

पांच वर्ष में रिव्यू से नहीं सुलझेगी समस्या
लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी ने कहा कि ओआरओपी की मांग को केंद्र ने एक तरीके से लागू ही नहीं किया। पांच वर्ष में पेंशन रिव्यू की जो व्यवस्था दी है वह उचित नहीं।
विज्ञापन


1996 में तत्कालीन सरकार ने 10 वर्ष का रिव्यू कर दिया था जिसे यूपीए सरकार ने वर्ष 2006 में दोहराया। पांच वर्ष का रिव्यू करना वन रैंक वन पेंशन नहीं है। हर वर्ष पेंशन रिव्यू होनी चाहिए या फिर कम से कम दो वर्ष में होनी चाहिए। वीआरएस, पांच वर्ष रिव्यू और गैर एक्ससर्विसमेन रिव्यू कमेटी अनुचित है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें