मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आंदोलन कर रहे कर्मचारी संगठनों से उनके मसलों का हल निकालने के लिए थोड़ा समय मांगा है, लेकिन कर्मचारी संगठन मोहलत देने के मूड में नहीं हैं।
उनका कहना है कि अभी तक कर्मचारी मोहलत ही दे रहे थे। कर्मचारी हड़ताल नहीं चाहते हैं, फिर भी वादाखिलाफी होने पर आंदोलन के लिए बाध्य हैं।
विभिन्न कर्मचारी संगठनों के शीर्ष संगठन राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद का कहना है कि शासन खुद ही ऐसे आदेश करता है जिससे कर्मचारी आंदोलित हों। विभिन्न संवर्गों का अलग-अलग आदेश होता है।
भिन्नता के कारण कर्मचारी आंदोलित हो जाते हैं। फिर शासन के अधिकारी सालों वादा करते रहते हैं। आखिर में कर्मचारी आंदोलित हो जाता है।
सोच-विचार के चक्कर में मसला लटका
बेहतर है कि मुख्यमंत्री समय लेने के बजाए फाइनल आदेश करवा दें। उसमें फिर किंतु-परंतु न हो। निर्धारित तिथि पर ही फैसला हो। परिषद के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर प्रह्लाद सिंह का कहना है कि सभी संवर्गों के लिए एक शासनादेश हो।
इसी में सभी की वेतन विसंगति की व्याख्या हो। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पर्याप्त समय पहले ही दिया जा चुका है। मुख्यमंत्री उनके मसले में फैसला करवा दें। सोच-विचार के चक्कर में मसला लटका रहता है।
वर्ष 2011 से ही समय दे रहे हैं। मिनिस्ट्रीयलकर्मियों की मांगों से संबंधित शासनादेश ही जारी करवाना है। एक दिन में हो जाएगा। इसमें कोई वित्तीय रुकावट भी नहीं है। अब टाइम नहीं देंगे।
-आशीष वर्मा, प्रांतीय महामंत्री उत्तराखंड कलक्ट्रेट मिनिस्ट्रीयल कर्मचारी संघ
राजस्व संग्रह अमीन पांच साल से समय ही तो दे रहा है। शासनादेश जारी करने में कौनसी परेशानी आ रही है। मुख्यमंत्री बात करेंगे, फिर टाइम दे देंगे। मामला लटकाने से क्या फायदा है, क्लियर कट बता दें, करेंगे कि नहीं?
वीरेंद्र सिंह सज्वाण, प्रांतीय महामंत्री उत्तराखंड राजस्व संग्रह अमीन संघ